नई दिल्ली | 17 अप्रैल, 2026
संसद के विशेष सत्र के दूसरे दिन आज भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला। महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने से संबंधित ‘131वां संविधान संशोधन विधेयक’ लोकसभा में पारित नहीं हो सका। सदन में अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण यह बिल गिर गया, जिससे आधी आबादी की वर्षों पुरानी उम्मीदों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है।
शुक्रवार शाम हुई इस ऐतिहासिक वोटिंग में बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 230 सांसदों ने मतदान किया। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक सदन की कुल संख्या के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन का आंकड़ा न मिल पाने के कारण यह विधेयक कानून का रूप नहीं ले सका।
वोटिंग से पहले सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त गतिरोध देखा गया:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से राजनीति से ऊपर उठकर इस बिल का समर्थन करने की भावुक अपील की थी।
गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को आगाह किया था कि यदि आज समर्थन नहीं मिला, तो यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से निकल जाएगा।
विपक्ष की आपत्ति: विपक्षी दलों ने इस बिल के समय और मंशा पर सवाल उठाए। विपक्ष का आरोप था कि यह बिल केवल आगामी पांच राज्यों (पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत) के चुनावों में राजनीतिक लाभ लेने के लिए लाया गया है।
विधेयक में प्रावधान था कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद 2029 के लोकसभा चुनावों से महिला आरक्षण लागू किया जाता। इसके लिए लोकसभा की सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 (लगभग 50% वृद्धि) करने का प्रस्ताव था।
उल्लेखनीय है कि 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ की अधिसूचना 16 अप्रैल, 2026 को ही जारी की गई थी, जिसके तहत 2027 की जनगणना के बाद 2034 में आरक्षण लागू होना था। इस नए संशोधन बिल का उद्देश्य उस प्रक्रिया को गति देना था, जो अब अधर में लटक गई है।
बिल गिरने के तुरंत बाद संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने परिसीमन से जुड़े दो अन्य बिलों पर आगे की कार्यवाही रोक देने की पहल की। सदन में इस विफलता के बाद सत्ता पक्ष में निराशा और विपक्ष में हमलावर रुख साफ देखा जा रहा है।
