कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हो गई है जिसकी भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पद से इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है। मंगलवार को कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके कड़े रुख ने राज्य में गंभीर संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा कर दी है।
ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों को स्वीकार करने के बजाय इसे एक ‘साजिश’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आधिकारिक तौर पर भले ही चुनाव आयोग ने उन्हें पराजित घोषित किया हो, लेकिन नैतिक रूप से वह जीत चुकी हैं। ममता ने दो टूक कहा, “इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता। मैं लोकभवन जाकर राज्यपाल को अपना त्यागपत्र नहीं सौंपूंगी।”
भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, विधानसभा चुनाव के परिणाम आने और बहुमत खोने के बाद मुख्यमंत्री का नैतिक और कानूनी दायित्व है कि वह राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपे।
वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 6 मई को समाप्त हो रहा है।
नियमतः कार्यकाल समाप्त होने से पहले निवर्तमान मुख्यमंत्री को पद छोड़ना होता है ताकि नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो सके
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि 9 मई को शुभेन्दु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह प्रस्तावित है। ऐसे में यदि ममता बनर्जी पदत्याग नहीं करती हैं, तो राज्यपाल के पास अनुच्छेद 164 के तहत विशेष शक्तियों का उपयोग कर मुख्यमंत्री को बर् बर्खास्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। यह देश के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री की बर्खास्तगी की सबसे दुर्लभ और ऐतिहासिक घटनाओं में से एक हो सकती है।
ममता बनर्जी का यह कदम सीधे तौर पर केंद्र, चुनाव आयोग और संवैधानिक प्रक्रियाओं को चुनौती देने वाला है। यदि 6 मई तक गतिरोध नहीं सुलझता है, तो केंद्र सरकार और राज्यपाल को प्रशासनिक शून्यता से बचने के लिए कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं। फिलहाल बंगाल की जनता और पूरे देश की नजरें राजभवन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
