देश के करोड़ों युवा छात्रों का भविष्य आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उनकी मेहनत और प्रतिभा से ज्यादा व्यवस्था की खामियां सुर्खियां बटोर रही हैं। देश की चार सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण प्रतियोगी व अकादमिक परीक्षाएं—नीट (NEET), सीबीएसई (CBSE), एसएससी (SSC) और सीयूईटी (CUET)—एक के बाद एक विवादों, तकनीकी विफलताओं और अनियमितताओं के चक्रव्यूह में फंस चुकी हैं।
कल 30 मई को देश भर में सामने आई सीयूईटी-यूजी (CUET-UG) परीक्षा की गंभीर तकनीकी खामियों और कुप्रबंधन ने इस कड़वी सच्चाई को एक बार फिर देश के सामने ला दिया है।
इन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को पारदर्शी, सुरक्षित और समय पर आयोजित कराने में केंद्र सरकार पूरी तरह से विफल साबित होती दिख रही है। नतीजा यह है कि आज देशभर के होनहार युवाओं में हताशा, निराशा और अपने भविष्य को लेकर एक गहरा असुरक्षा का माहौल व्याप्त हो चुका है।
न जवाबदेही तय, न कोई बड़ी कार्रवाई: प्रशासनिक सुस्ती का आलम
इस पूरे संकट में सबसे ज्यादा हैरान और परेशान करने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी परीक्षाओं में बार-बार गड़बड़ी होने के बावजूद अब तक इन परीक्षाओं को आयोजित करने वाली समिति के जिम्मेदार वरिष्ठतम स्तर के अधिकारियों की पहचान नहीं हो पाई है। और ना ही उन तक पहुंचने के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया है। परीक्षा आयोजित कराने वाली मुख्य टीम या उच्चाधिकारियों तक पहुंचना या उनपर अब तक किसी बड़ी और अनुशासनात्मक कार्रवाई का न होना यह साफ करता है कि तंत्र में गंभीरता की भारी कमी है।
जब तक शीर्ष स्तर पर बैठे जिम्मेदारों पर गाज नहीं गिरेगी, तब तक परीक्षा प्रणाली में सुधार की उम्मीद बेमानी है। सरकार का किसी पर सीधी जिम्मेदारी तय न करना प्रशासनिक सुस्ती और इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे के प्रति ढुलमुल रवैये को उजागर करता है।
सिर्फ CBI जांच की घोषणा: कर्तव्य से मुक्ति या खानापूर्ति?
हर बार जब किसी परीक्षा में धांधली या पेपर लीक का बड़ा मामला सामने आता है, तो सरकार की तरफ से एक बंधी-बंधाई प्रतिक्रिया आती है—”मामले की जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी जाएगी।” ऐसा प्रतीत होता है मानो केंद्र सरकार इस जांच की घोषणा करके अपने मुख्य कर्तव्यों और जवाबदेही से पूरी तरह मुक्ति पा लेती है।
लेकिन क्या सिर्फ सीबीआई जांच ही इस लाइलाज होती बीमारी का हल है? आंकड़ों और पिछले अनुभवों पर नजर डालें तो देश भर में गंभीर और जटिल प्रशासनिक घोटालों में सीबीआई का सफलता का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद निराशाजनक रहा है। कई विश्लेषणात्मक समीक्षाओं के अनुसार, सीबीआई का अंतिम सफलता (कन्विक्शन) रेट इतना कम है कि 99 प्रतिशत मामलों में समय पर दोषियों को कोई कड़ी सजा नहीं मिल पाती। ऐसे में महज एक औपचारिक सीबीआई जांच की घोषणा से देश के लाखों-करोड़ों युवाओं के साथ निरंतर हो रही इस अनियमितता का न्याय होना मुमकिन नहीं लगता।
युवाओं की मांग: अब पारदर्शी ‘NIA’ जांच से ही साफ होगा सच
परीक्षाओं में होने वाली यह निरंतर धांधली अब महज एक साधारण प्रशासनिक चूक नहीं रह गई है। यह देश की युवा शक्ति के भविष्य के खिलाफ रचा जा रहा एक बड़ा और सुव्यवस्थित संगठित अपराध (सिंडिकेट) बन चुका है। अगर केंद्र सरकार वाकई देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को लेकर रत्ती भर भी गंभीर है, तो उसे अब ढुलमुल रवैया छोड़ना होगा:
समय की मांग: इन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में हो रही धांधली, तकनीकी सेंधमारी और पेपर लीक जैसे गंभीर मामलों की जांच NIA (National Investigation Agency – राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को सौंपी जानी चाहिए। एनआईए का कड़ा कानूनी दायरा और अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड ही इस परीक्षा माफिया के मन में खौफ पैदा कर सकता है।
एनआईए के माध्यम से इस पूरे परीक्षा माफिया सिंडिकेट की जड़ों तक पहुंचकर जांच की जाए, दोषियों को चिन्हित किया जाए और उन्हें ऐसी कठोर सजा दिलवाई जाए जो भविष्य के लिए एक नजीर बन सके।
सुलगता हुआ निष्कर्ष
युवाओं का भरोसा देश की लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर बनाए रखने के लिए अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। सरकार को यह समझना होगा कि केवल जांच की घोषणाओं के सहारे समय नहीं काटा जा सकता। सरकार को तत्काल अपनी गंभीरता दिखाते हुए एक ऐसी अभेद्य, पारदर्शी और आधुनिक परीक्षा प्रणाली का निर्माण करना होगा, जहां किसी भी छात्र की मेहनत तकनीकी विफलता या भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े। आखिर देश के इन करोड़ों युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?
