पटना: बिहार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में हमेशा से बयानबाजी होती रही है। लेकिन हाल ही में प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज द्वारा अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर साझा किए गए एक पोस्टर (image.png) ने इस बहस को एक बिल्कुल नया और तीखा मोड़ दे दिया है।
सोशल मीडिया पर साझा किए गए पोस्टर में बिहार के पिछले अनेक वर्षों के प्रमुख वित्त मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता को दर्शाते हुए एक सीधा और धारदार सवाल पूछा गया है: “जब वित्त मंत्री होंगे ऐसे तो बिहार सुधरेगा कैसे?”
पोस्टर में क्या है?
इस पोस्टर में राज्य के उन दिग्गज नेताओं की तस्वीरें और उनकी कथित शैक्षणिक योग्यता दिखाई गई है, जिन्होंने अलग-अलग समय पर बिहार के वित्त विभाग की कमान संभाली है:
राबड़ी देवी: 5वीं पास
सम्राट चौधरी: 7वीं फेल
तारकिशोर प्रसाद: 12वीं पास
बिजेंद्र प्रसाद यादव: 12वीं पास
सुशील कुमार मोदी: एमएससी बॉटनी (M.Sc. Botany)
विजय चौधरी: एमए इतिहास (M.A. History)
इस ग्राफिक के जरिए जनसुराज ने सीधे तौर पर यह तंज कसा है कि जिस राज्य का खजाना और आर्थिक नीतियां तय करने वाले नेतृत्व के पास अर्थशास्त्र या वित्तीय प्रबंधन की पृष्ठभूमि ही न हो, वह राज्य विकास की दौड़ में आगे कैसे बढ़ सकता है?
सवाल सिर्फ डिग्री का नहीं, प्रशासनिक क्षमता और ‘परिणाम’ का है
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि केवल एक डिग्री किसी व्यक्ति की प्रशासनिक क्षमता तय नहीं करती। कई बार बिना बड़ी डिग्रियों के भी राजनेताओं ने बेहतरीन सलाहकार टीमों (Advisory Teams) के दम पर शानदार काम किया है। लेकिन असली सवाल ‘परिणाम’ का है।
वित्त विभाग किसी भी राज्य की रीढ़ होता है। बजट बनाना, सीमित संसाधनों का सही आवंटन करना, नए निवेश (Investments) को आकर्षित करना और राज्य की प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाना — इन सभी का सीधा असर जनता के जमीनी जीवन पर पड़ता है। बिहार में सालों से रोजगार, बदहाल शिक्षा, चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था और रिकॉर्ड स्तर पर होने वाला पलायन (Migration) आज भी सबसे बड़े नासूर बने हुए हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारे नेतृत्व के पास राज्य को आगे ले जाने के लिए कोई स्पष्ट ‘आर्थिक विजन’ है भी या नहीं?
नारों से थक चुकी जनता अब मांग रही है सीधा हिसाब
बिहार की राजनीति दशकों से जातिगत समीकरणों, बड़े-बड़े वादों और लोकलुभावन नारों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन जनसुराज का यह हमला इस बात का संकेत है कि अब राज्य में ‘जवाबदेही की राजनीति’ की मांग बढ़ रही है।
लाखों युवा आज भी बेहतर भविष्य और अदद नौकरी के लिए राज्य से बाहर जाने को मजबूर हैं। अब जनता केवल कागजी दावों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। लोग अब सीधे और तीखे सवाल पूछ रहे हैं:
पिछले वर्षों में बिहार में कितने बड़े उद्योग आए?
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए?
पलायन को रोकने में नीतियां कितनी कारगर रहीं?
जनसुराज का यह पोस्टर भले ही एक राजनीतिक तंज हो, लेकिन इसने बिहार के नीति-निर्माताओं को आईना जरूर दिखाया है। डिग्री चाहे जो भी हो, अगर नीतियां राज्य की गरीबी और बेरोजगारी को दूर नहीं कर पा रही हैं, तो प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल उठना पूरी तरह स्वाभाविक है। अब देखना यह है कि सत्तापक्ष इस ‘आर्थिक विजन’ के सवाल पर क्या जवाब देता है।
