Sunday, August 23, 2026
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एआई (AI) के दावों की खुली पोल! अदालतों को बम से उड़ाने की धमकी देने वाले अपराधियों के सामने क्यों असहाय है पुलिस?

पटना/पीलीभीत: बिहार के विभिन्न जिला न्यायालयों को बम से उड़ाने की लगातार मिल रही धमकियों ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और साइबर सेल की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस जांच में इस सनसनीखेज मामले के तार उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले से जुड़े हैं।

हालांकि, हाई-टेक दावों के बीच बिहार पुलिस की आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) को लंबी छापेमारी और पूछताछ के बाद भी खाली हाथ ही लौटना पड़ा है, जिसने एक बार फिर देश के जांच तंत्र की सीमाओं को उजागर कर दिया है।

​रिटायर्ड अधिकारी की बंद ईमेल आईडी से रची गई साजिश

​जांच से जुड़े आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, जनवरी से मार्च के बीच बिहार के कई जिला न्यायालयों को दहलाने की धमकी भरे ईमेल भेजे गए थे। मामला न्यायालयों की सुरक्षा से जुड़ा होने के कारण इसकी जांच बिहार एटीएस को सौंपी गई।

एटीएस की साइबर सेल ने जब इन धमकी भरे ईमेल्स का तकनीकी विश्लेषण (IP एड्रेस और डेटा ट्रेल) किया, तो एक ईमेल आईडी उत्तर प्रदेश के पीलीभीत निवासी एक सेवानिवृत्त अधिकारी की निकली।

​इस महत्वपूर्ण लीड के बाद बिहार एटीएस ने तत्काल यूपी एटीएस से संपर्क साधा। शुक्रवार को दोनों राज्यों की संयुक्त टीम ने पीलीभीत पहुंचकर स्थानीय पुलिस के सहयोग से छापेमारी शुरू की। पुलिस ने रिटायर्ड अधिकारी और एक अन्य युवक को हिरासत में लेकर शुक्रवार रात से शनिवार दोपहर तक कड़ी पूछताछ की।

​शातिर साइबर अपराधियों ने सुरक्षा चक्र को भेदा

​पूछताछ के दौरान रिटायर्ड अधिकारी ने स्वीकार किया कि ईमेल आईडी उन्हीं की है, लेकिन वह कई साल पहले ही ब्लॉक हो चुकी थी और लंबे समय से निष्क्रिय थी। एटीएस की गहन पड़ताल और तकनीकी जांच के बाद दोनों संदिग्घों की इस मामले में कोई संलिप्तता नहीं पाई गई, जिसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया।

पीलीभीत के एसपी सुकीर्ति माधव ने मामले की पुष्टि करते हुए कहा, “बिहार एटीएस की टीम स्थानीय पुलिस के सहयोग से जांच करने आई थी। दो लोगों से लंबी पूछताछ की गई, लेकिन कोई भी आपराधिक तथ्य या संलिप्तता सामने नहीं आई है।”

विशेषज्ञों का अंदेशा है कि इस पूरे खेल के पीछे बेहद शातिर और तकनीक के जानकार साइबर अपराधी (हैकर) हैं। उन्होंने किसी प्रकार इस लंबे समय से बंद पड़ी ईमेल आईडी को रिकवर या हैक किया और कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए इसी आईडी से धमकी भरे संदेश भेज दिए ताकि जांच एजेंसियों का ध्यान भटकाया जा सके।

​दावों और हकीकत में बड़ा फासला: एआई (AI) के युग में बेबस जांच एजेंसियां

​यह मामला केवल एक झूठी धमकी का नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सुरक्षा और जांच तंत्र को अपराधियों द्वारा दी गई एक सीधी चुनौती है।

केंद्र सरकार से लेकर बिहार का गृह मंत्रालय समय-समय पर पुलिसिया जांच और कानून व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), बिग डेटा एनालिसिस और अत्याधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के बड़े-बड़े दावे करता रहा है। लेकिन धरातल की हकीकत इन दावों से कोसों दूर नजर आती है।

​हाल के दिनों में न केवल न्यायालयों, बल्कि बिहार विधानसभा और कई महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों को भी बम से उड़ाने की धमकियाँ ईमेल और फोन कॉल के जरिए मिल चुकी हैं।

हर बार इन धमकियों के बाद सरकारी महकमों में अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है। सुरक्षा बल, डॉग स्क्वायड और बम निरोधक दस्ते घंटों तक चप्पा-चप्पा छानते हैं, जिससे न केवल जनता में दहशत फैलती है बल्कि सरकारी संसाधनों और समय का भी भारी नुकसान होता है।

​आखिर कब पकड़े जाएंगे असली गुनहगार?

​इस ताजा मामले में भी बिहार पुलिस को एक पुख्ता लीड मिलने के बावजूद अंततः खाली हाथ ही लौटना पड़ा। अपराधी जांच एजेंसियों से दो कदम आगे चल रहे हैं और हमारी एजेंसियां केवल आईपी एड्रेस और बंद पड़ी आईडी के पीछे भागने को मजबूर हैं।

​यह घटना इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि जब तक हमारी साइबर जांच एजेंसियां पारंपरिक तरीकों को छोड़कर डार्क वेब, प्रॉक्सी सर्वर और ईमेल स्पूफिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को क्रैक करने में सक्षम नहीं होंगी, तब तक ये डिजिटल अपराधी देश की सुरक्षा व्यवस्था के साथ इसी तरह खिलवाड़ करते रहेंगे।

सवाल जस का तस बना हुआ है—आखिर एआई और डिजिटल इंडिया के इस दौर में हमारा जांच तंत्र इन अदृश्य अपराधियों के सामने इतना असहाय क्यों है?

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