बिष्णु नारायण चौबे
उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए निर्णय दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) में धर्मांतरण करता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे का दावा नहीं कर सकता।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत मिलने वाले आरक्षण और सुरक्षात्मक लाभ (जैसे SC/ST एक्ट) का आधार केवल उन्हीं धर्मों तक सीमित है, जिन्हें राष्ट्रपति के 1950 के आदेश में अधिसूचित किया गया है।
धर्म की सीमा: जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्ति ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आ सकते हैं।
SC/ST एक्ट का लाभ: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्मांतरित व्यक्ति (जैसे ईसाई धर्म अपनाने वाला) SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि धर्मांतरण के साथ ही उसका मूल जातिगत दर्जा समाप्त हो जाता है।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला बरकरार: शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का लाभ देने से इनकार किया गया था।
संविधान का अनुच्छेद 341 राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वह उन जातियों को अधिसूचित करें जिन्हें “अनुसूचित जाति” माना जाएगा। वर्तमान नियमों के तहत:
प्रारंभिक आदेश: 1950 में यह केवल हिंदू धर्म तक सीमित था।
संशोधन: 1956 में सिख और 1990 में बौद्ध धर्म को इसमें शामिल किया गया।
ईसाई और इस्लाम: इन धर्मों में जाति प्रथा की शास्त्रीय मान्यता न होने के कारण इन्हें इस सूची से बाहर रखा गया है।
फैसले का प्रभाव
यह फैसला उन याचिकाओं और विवादों पर विराम लगाता है जहाँ धर्मांतरित व्यक्ति सामाजिक और कानूनी लाभों के लिए अपने मूल जाति प्रमाण पत्र का उपयोग करने का प्रयास करते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्मांतरण केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह उन विशेष अधिकारों को भी प्रभावित करता है जो किसी विशिष्ट धार्मिक-सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं।
