5 मई, 2026
राजनीति के गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि सत्ता शीर्ष पर दो ताकतवर व्यक्तित्वों के बीच वर्चस्व की जंग अनिवार्य है। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पिछले तीन दशकों से इस धारणा को न केवल गलत साबित किया है,
बल्कि एक ऐसा मॉडल पेश किया है जहाँ ‘व्यक्ति’ से बड़ा ‘लक्ष्य’ होता है। बंगाल चुनाव 2026 के नतीजों ने एक बार फिर अमित शाह की उस ‘माइक्रो-प्लानिंग’ और ‘लो-प्रोफाइल’ निष्ठा को सुर्खियों में ला दिया है, जिसने बीजेपी को एक ऐतिहासिक जीत दिलाई है।
स्कूटर से सत्ता के शिखर तक: एक अटूट निष्ठा
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के धुर विरोधी माने जाते रहे है। लेकिन उन्होंने अपने पुराने दिनों के संस्मरणों का हवाला देते हुए लिखा है कि वे उस दौर में गुजरात बिट देखते थे। और गुजरात भाजपा मुख्यालय भी कवर करते थे।
90 के दशक में ये मोदी-शाह की जोड़ी गुजरात की गलियों में स्कूटर पर पोस्टर चिपकाती थी। और परिणाम सकारात्मक परिणाम आने के बावजूद अंदर कार्यालय में मंत्रिमंडल बंटवारे की बैठक हो रही होती थी और ये दोनों बाहर बेंच पर बैठे दिखते थे।
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के अनुसार उस समय भी शाह का रुख स्पष्ट था— “हमारा काम कैंपेन करना है, सरकार बनाना नेताओं का काम है।”
आज भी, जब अमित शाह देश के सबसे ताकतवर गृह मंत्रियों में से एक हैं, मोदी के प्रति उनका सम्मान और ‘दो कदम पीछे’ रहने की शालीनता यह दर्शाती है कि उन्होंने स्वेच्छा से ‘डिप्टी’ की भूमिका को आत्मसात किया है।
सार्वजनिक मंचों पर जीत का श्रेय मोदी और कार्यकर्ताओं को देना और खुद पीछे बैठकर तालियाँ बजाना, आज की आत्ममुग्ध राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है।
बंगाल 2026: ‘ओवर-प्रोविजनिंग’ की गलती से लिया सबक
2021 की हार के बाद, अमित शाह ने बंगाल को अपनी व्यक्तिगत चुनौती के रूप में लिया था। इस बार की रणनीति में ‘मैक्रो से माइक्रो’ तक के बदलाव साफ़ दिखे:
यथार्थवादी लक्ष्य: 2021 की ‘200 पार’ की आक्रामक बयानबाजी के बजाय, इस बार कैडर को 170 सीटों का व्यावहारिक लक्ष्य दिया गया, जिससे कार्यकर्ताओं में यह भरोसा जागा कि ‘यह संभव है’।
विपक्ष की काट: ममता बनर्जी की हर संभावित चाल का शाह ने पहले ही ‘काउंटर-प्लान’ तैयार कर रखा था।
ग्राउंड जीरो पर उपस्थिति: चुनाव के अंतिम दो हफ्तों में बंगाल में डेरा डालना और सोशल मीडिया पर आम जनता (जैसे रोड शो का इंतज़ार कर रही लड़की को जवाब देना) के साथ सीधा संवाद करना, उनके ‘मास लीडर’ और ‘आर्किटेक्ट’ होने का प्रमाण है।
इदं न मम’: जीत के बाद भी वही सादगी
बंगाल की इस जीत के पीछे अमित शाह की मेहनत और उनके ‘बोल्ड’ फैसलों का सबसे बड़ा हाथ है। लेकिन जैसा कि अक्सर देखा जाता है, जीत की बड़ी रैली में वह फिर से अपनी उसी चिर-परिचित भूमिका में नज़र आए—मोदी के पीछे खड़े एक कर्मठ सिपाही के रूप में।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी के विज़न को ज़मीन पर उतारने के लिए अमित शाह जैसा ‘डिप्टी’ होना बीजेपी की सबसे बड़ी मजबूती है। संस्कृत के ‘इदं न मम’ (यह मेरा नहीं है) के भाव के साथ काम करने की यह कला ही उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे सफल चुनावी रणनीतिकार बनाती है।
