G-HMMWBCZ928
Friday, October 30, 2026
HomeTop Storiesराज्य में 25 नई चीनी मिलों की शुरुआत की सरकारी घोषणा महज...

राज्य में 25 नई चीनी मिलों की शुरुआत की सरकारी घोषणा महज ढकोसलेबाजी: अनेक चुनौतियां

​बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की नई सरकार के गठन के बाद उद्योग जगत और कृषि क्षेत्र में नई जान फूंकने के दावे किए जा रहे हैं. सरकार की ओर से सबसे बड़ी घोषणाओं में राज्य के अंदर 25 नई चीनी मिलें स्थापित करने और 9 बंद पड़ी पुरानी मिलों को दोबारा शुरू करने का खाका खींचा गया है. इस खबर से जहां आम किसानों में एक उम्मीद जगी है, वहीं जमीनी स्तर पर काम करने वाले किसान संगठनों ने इसे पूरी तरह से ‘ढकोसलेबाजी’ और ‘चुनावी लोक-लुभावन’ घोषणा करार दिया है.

​बिहार राज्य गन्ना किसान मोर्चा के अध्यक्ष अशोक प्रसाद सिंह ने सरकार के इन दावों पर कई गंभीर तकनीकी, आर्थिक और व्यावहारिक सवाल उठाए हैं. उनके मुताबिक, बिना सही आकलन और ठोस रणनीति के की गई यह घोषणाएं सिर्फ कागजी ‘ख्याली पुलाव’ बनकर रह जाएंगी.

​गन्ने की कमी: 8 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य और 2.37 लाख की हकीकत

​सरकार का दावा है कि राज्य में गन्ने की खेती को बढ़ाकर मिलों की 9जरूरत पूरी की जाएगी. इसके लिए गन्ना उद्योग विभाग गन्ना बीजों पर 50% अनुदान (अधिकतम 5 एकड़ तक) देने और 15 दिनों में किसानों का पंजीकरण करने की बात कह रहा है.

​लेकिन गणित कुछ और ही बयां करता है:

​घोषणा को पूरा करने के लिए जरूरी क्षेत्र: लगभग 8 लाख हेक्टेयर

​वर्तमान में हो रही खेती का क्षेत्र: मात्र 2.37 लाख हेक्टेयर
पेराई का गणित: एक औसत चीनी मिल को प्रतिदिन लगभग 50,000 क्विंटल गन्ने की आवश्यकता होती है, और यह पेराई सत्र करीब 140 दिनों तक चलता है. वर्तमान में बिहार में एक एकड़ में अच्छी फसल होने पर भी अधिकतम 200 क्विंटल उत्पादन होता है. ऐसे में 34 मिलों को लगातार चलाने के लिए गन्ने का रकबा रातों-रात तीन गुना से अधिक करना व्यावहारिक रूप से असंभव नजर आता है.

​देश में सबसे कम गन्ने का मूल्य: बिहार के किसानों का शोषण

​किसान मोर्चा के अनुसार, नई मिलें खोलने से पहले सरकार को वर्तमान में चल रही मिलों के किसानों की हालत देखनी चाहिए. बिहार के गन्ना किसानों को अन्य राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल की तुलना में सबसे कम मूल्य मिल रहा है, जो उनकी उपेक्षा को दर्शाता है:

राज्य / देश। गन्ने का मूल्य (प्रति क्विंटल)
नेपाल –              ₹440
हरियाणा –           ₹416
पंजाब –               ₹415
उत्तराखंड –          ₹405
उत्तर प्रदेश –         ₹400
बिहार –                 ₹380

जब महज 10 चालू चीनी मिलों के रहते हुए भी विभाग किसानों को सही और प्रतिस्पर्धी मूल्य नहीं दे पा रहा है, तो 25 नई मिलें खुलने के बाद सरकार उन्हें क्या दाम देगी? यह किसानों के मन में एक बड़ा संशय पैदा करता है.

‘लंदन की चाय’ से लेकर ‘मिलों के बंद’ होने का सफर

एक समय था (1904 से 1940 के बीच) जब बिहार में 33 चीनी मिलें चालू थीं और बिहार देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक था. इतिहास गवाह है कि ब्रिटेन की महारानी जब अपने मेहमानों को चाय पिलाती थीं, तो गर्व से कहती थीं कि इस चाय में “बिहार की चीनी” घुली हुई है.

लेकिन 1980 से 2005 के बीच बिहार राज्य चीनी निगम के भीतर फैली कथित लूट-खसोट, भ्रष्टाचार और मिल प्रबंधन की मनमानी के कारण 18 चीनी मिलें दम तोड़ गईं. आज स्थिति यह है कि:

केवल 10 चीनी मिलें ही बिहार में किसी तरह चल पा रही हैं.

कुल पेराई क्षमता 64,500 टन प्रतिदिन है, लेकिन पर्याप्त गन्ना न मिलने के कारण या तो पेराई का सीजन छोटा कर दिया जाता है या मिलें अपनी पूरी क्षमता पर काम नहीं कर पाती हैं.

ठोस नीति या सिर्फ राजनीतिक दिखावा?

बिहार राज्य गन्ना किसान मोर्चा का साफ कहना है कि राज्य सरकार ने जमीनी स्तर पर गन्ना उत्पादन की वास्तविक परिस्थितियों और किसानों की वित्तीय स्थिति का सही आकलन नहीं किया है. गन्ने का सबसे कम दाम, पूर्व के बकाया भुगतान में देरी और सरकारी तंत्र के प्रति अविश्वास के माहौल के रहते नए क्षेत्रों में गन्ने का विस्तार करना बेहद कठिन है.

यदि सरकार ने जल्द ही गन्ने के मूल्य में सम्मानजनक वृद्धि नहीं की और किसानों का भरोसा नहीं जीता, तो नई चीनी मिलें खोलना तो दूर, वर्तमान में चल रही 10 मिलें भी बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगी. ऐसे में 25 नई चीनी मिलों की यह घोषणा सिर्फ एक प्रशासनिक ढकोसलेबाजी से ज्यादा और कुछ नहीं दिखती.

यह भी पढ़े

अन्य खबरे