पटना:
बिहार के भोजपुर में हुआ भरत तिवारी एनकाउंटर मामला अब महज एक ‘पुलिसिया कार्रवाई’ नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य के प्रशासनिक तंत्र, पुलिस की कार्यप्रणाली और सुशासन के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान बन चुका है। एक तरफ जहां राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मृतक भरत तिवारी को ‘सिरफिरा’ करार दिया था, वहीं दूसरी तरफ पुलिस के आला अधिकारी यानी एडीजी सुधांशु कुमार द्वारा इस पूरे मामले में पुलिस की गलती स्वीकार करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
1. लाइव वीडियो और सरेंडर के बाद एनकाउंटर: पुलिस की थ्योरी पर उठे सवाल
इस पूरी घटना का सबसे विवादित और चौंकाने वाला पहलू वह लाइव वीडियो है, जो घटना के दौरान ही सामने आया। वीडियो साक्ष्यों के अनुसार, भरत तिवारी ने शुरुआत में पुलिस को पिस्तौल दिखाकर डराने या पीछे धकेलने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन बाद में उसने अपनी पिस्तौल फेंक दी थी।
पिस्तौल फेंकने और आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने की मंशा साफ होने के बावजूद पुलिस द्वारा उसे गोली मार देना और फिर मीडिया के सामने इसे एक ‘वीरतापूर्ण एनकाउंटर’ के रूप में पेश करना, पुलिसिया थ्योरी को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करता है। एडीजी सुधांशु कुमार द्वारा पुलिस की गलती मानना इस बात की पुष्टि करता है कि यह आत्मरक्षा में चलाई गई गोली नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रक्रियात्मक विफलता या जानबूझकर की गई कार्रवाई थी।
2. ‘अपराधी’ बनाम ‘जनता का पैरोकार’: क्या थी भरत तिवारी की सच्चाई?
सरकार और प्रशासन भले ही भरत तिवारी को एक ‘सिरफिरा’ या अपराधी साबित करने पर तुले थे, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों की आवाज कुछ और ही कहानी बयां करती है। ग्रामीणों के अनुसार, भरत तिवारी कोई पेशेवर अपराधी नहीं था, बल्कि वह नदी के कटाव में बेघर हुए गरीबों और विभिन्न जातियों के लोगों के हक की लड़ाई लड़ रहा था।
विस्थापित ग्रामीणों को सही जगह पर जमीन मिले, बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं मिलें, इसके लिए वह लगातार प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काट रहा था और संघर्ष कर रहा था। स्थानीय लोगों का खुला आरोप है कि भरत तिवारी के पास प्रशासनिक भ्रष्टाचार के ऐसे सबूत थे जो बड़े-बड़े अधिकारियों को बेनकाब कर सकते थे। ग्रामीणों का मानना है कि इसी भ्रष्टाचार को दबाने के लिए पुलिस और प्रशासन की मिलीभगत से भरत तिवारी की ‘सुनियोजित हत्या’ की गई है।
3. मुख्यमंत्री के दावों की कसौटी: अपराध खत्म करने का नारा और कड़वी हकीकत
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार बिहार से अपराध और अपराधियों को जड़ से खत्म करने का दावा कर रहे हैं। लेकिन भोजपुर की यह घटना दिखाती है कि सरकार सिर्फ लक्षणों का इलाज कर रही है, बीमारी की मुख्य वजह का नहीं।
अपराध को खत्म करने के लिए उन कारणों को खत्म करना जरूरी है जो किसी आम नागरिक को हथियार उठाने पर मजबूर करते हैं। बिहार में शासन और प्रशासन के निचले से लेकर ऊपरी स्तर तक फैला भ्रष्टाचार आज दोहरी भूमिका निभा रहा है:
- अपराधियों को संरक्षण: भ्रष्टाचार के बल पर संगीन से संगीन अपराध करने वाले अपराधी निर्भीक घूम रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि पैसे के दम पर सिस्टम को मैनेज किया जा सकता है।
- आम जनता में आक्रोश: जब एक आम नागरिक अपने जायज हक (जैसे घर, जमीन या न्याय) के लिए दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक जाता है और हर जगह उससे रिश्वत मांगी जाती है, तो सिस्टम के खिलाफ उसका यह सब्र टूट जाता है। भरत तिवारी का मामला भी इसी प्रशासनिक घुन (भर्चटाचार) का नतीजा है, जिसने जनहित की लड़ाई लड़ने वाले एक युवक को अपनी बात सुनाने के लिए हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया।
निष्कर्ष: केवल गलती मानना काफी नहीं, न्याय की जरूरत
एडीजी द्वारा पुलिस की गलती मान लेना इस मामले का अंत नहीं हो सकता। यह घटना साफ करती है कि बिहार में पुलिसिंग और प्रशासनिक जवाबदेही की स्थिति कितनी चिंताजनक है। अगर कोई व्यक्ति सरेंडर कर रहा है, तो उसे कोर्ट के सामने पेश करने के बजाय गोली मार देना ‘तालिबानी मानसिकता’ को दर्शाता है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को समझना होगा कि सिर्फ अपराधियों को डराने से अपराध खत्म नहीं होगा; जब तक थानों और अंचलों (ब्लॉक) से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, तब तक न्याय की उम्मीद बेमानी है। भरत तिवारी मामले की एक स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच (जैसे न्यायिक जांच) होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि इस एनकाउंटर के पीछे असली चेहरा किस भ्रष्ट अधिकारी या राजनेता का था।
