अमित कुमार
समस्तीपुर/पटना: बिहार की विकास यात्रा में मील का पत्थर मानी जा रही 18,000 करोड़ रुपये की पटना-पूर्णिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे परियोजना इस समय विवादों के भंवर में फंस गई है। समस्तीपुर जिले के सरायरंजन ब्लॉक में एक्सप्रेसवे के रूट में अचानक किए गए बदलाव ने एक बड़े जन-आंदोलन की जमीन तैयार कर दी है। स्थानीय निवासियों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि राजनीतिक रसूखदारों की जमीन बचाने के लिए एक्सप्रेसवे का रूट बदला गया है, जिससे अब सैकड़ों गरीब परिवारों के आशियाने और एक ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान पर बुलडोजर चलने का खतरा मंडरा रहा है।
क्या है रूट का विवाद?
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा कराए गए शुरुआती स्वतंत्र सर्वेक्षण में एक्सप्रेसवे का रास्ता कांकलीपुर और झखरा गांव की दक्षिणी सीमा पर स्थित धनहर चौर (निचली कृषि भूमि) से तय किया गया था। यह NHAI के मूल दिशानिर्देशों के बिल्कुल अनुकूल था, जिसके तहत एक्सप्रेसवे को घनी आबादी से दूर रखना होता है।
अचानक हुआ बदलाव: मार्च 2026 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा जारी तीसरी गजट अधिसूचना में 48वें से 53वें किलोमीटर के बीच का रूट अचानक बदल दिया गया। इस नए रूट के दायरे में हरलोचनपुर, भगवतपुर, सरायरंजन और झखरा गांव के कुल 237 भूखंड आ गए हैं, जिनमें से 224 निजी स्वामित्व वाले हैं।
’वीआईपी’ की जमीन बचाने का आरोप
दो दर्जन से अधिक प्रभावित घर और दुकान मालिकों ने 1 जून को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखकर सीधे तौर पर बिहार के उपमुख्यमंत्री और स्थानीय जदयू (JD-U) विधायक विजय कुमार चौधरी पर आरोप लगाए हैं।
आरोप: उपमुख्यमंत्री ने अपने करीबी रिश्तेदार विनीत ईश्वर उर्फ बॉबी ईश्वर की लगभग 10.5 बीघा कीमती जमीन को बचाने के लिए राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल कर रूट बदलवाया।
सफाई: उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि रूट तय करना पूरी तरह NHAI का काम है, इसमें उनका कोई हस्तक्षेप नहीं है। वहीं बॉबी ईश्वर का दावा है कि नए रूट में उनकी खुद की 6 बीघा जमीन प्रभावित हो रही है।
६,००० छात्रों के भविष्य पर संकट
इस रूट परिवर्तन का सबसे बड़ा खामियाजा स्थानीय शिक्षा व्यवस्था को भुगतना पड़ सकता है। बदले हुए नक्शे की जद में 65 साल पुराना केदार संत रामाश्रय कॉलेज आ रहा है।
”यदि यह रूट लागू हुआ तो 6,000 से अधिक छात्र-छात्राओं की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो जाएगी। निकटतम डिग्री कॉलेज (दलसिंहसराय) यहाँ से 20 किलोमीटर दूर है।” — बिपिन झा, प्राचार्य
कॉलेज के लिए भूमि दान करने वाले परमानंद ईश्वर ने भी साफ कर दिया है कि वे कॉलेज की एक ईंट भी टूटने नहीं देंगे और इसके लिए कड़ा संघर्ष करेंगे। इसके अलावा, सरायरंजन बाजार और आसपास के इलाकों में 150 से अधिक घर और दर्जनों दुकानें जमींदोज होने की कगार पर हैं।
बटी हुई सरकार और अफसरों के पेंच
इस मामले ने बिहार की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में भी खींचतान बढ़ा दी है:
आश्वासन और जांच: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए NHAI और बिहार के पथ निर्माण विभाग से संयुक्त जांच कराने का भरोसा दिया है। उन्होंने माना कि रूट तय करने में राज्य सरकार की भी भूमिका होती है।
केंद्रीय हस्तक्षेप: उजियारपुर के सांसद और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने स्थानीय जनता की मांग का समर्थन करते हुए इस विषय को नितिन गडकरी के सामने उठाया है और मूल रूट को बहाल करने के लिए MoRTH से आदेश जारी करवाने का प्रयास कर रहे हैं।
अफसरशाही का अड़ंगा: दूसरी तरफ, NHAI के बिहार क्षेत्रीय अधिकारी एन. एल. येओटकर और परियोजना निदेशक राजू कुमार का कहना है कि नियमों के मुताबिक, एक बार गजट में अधिसूचित हो चुके रूट में बदलाव करना संभव नहीं है।
जन-आंदोलन की आहट
आंदोलन की अगुवाई कर रहे भाजपा नेता रंजीत निर्गुणी ने केंद्र सरकार को दो टूक चेतावनी दी है:
”नई गजट अधिसूचना में रूट की साफ हेराफेरी दिखती है। जहां मूल रूट में केवल 5 से 10 घर प्रभावित होते, वहां अब 150 घर और दुकानें तोड़ी जा रही हैं। यदि केंद्र सरकार ने शीघ्र हस्तक्षेप नहीं किया तो बड़े जन-आंदोलन के लिए तैयार रहें।”
सरायरंजन नगर पंचायत की मुख्य पार्षद पूजा कुमारी भी पिछले साल जुलाई से ही इस बदलाव के विरोध में केंद्रीय मंत्रियों को पत्र लिख रही हैं।
🛣️ कितना महत्वपूर्ण है यह प्रोजेक्ट?
विशेषता विवरण
कुल लंबाई – 244.93 किलोमीटर (6-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर)
अनुमानित लागत – ₹18,000 करोड़
प्रमुख संरचनाएं – 21 बड़े पुल, 140 छोटे पुल, 9 रेलवे ओवरब्रिज
प्रभावित जिले – वैशाली, समस्तीपुर, मधेपुरा, पूर्णिया
समय की बचत – पटना से पूर्णिया का सफर 8 घंटे से घटकर 4 घंटे रह जाएगा
वर्तमान स्थिति: समस्तीपुर जिले में 64.7 किलोमीटर के दायरे में भूमि अधिग्रहण के लिए MoRTH ने केंद्रीय गजट अधिसूचना जारी कर दी है और जिला पंजीयन कार्यालय ने जमीनों की सरकारी दरें (MVR) भी बढ़ा दी हैं।
निष्कर्ष: विकास और जनहित के बीच का यह टकराव अब दिल्ली के गलियारों तक पहुंच चुका है। देखना होगा कि नितिन गडकरी का मंत्रालय विकास की रफ्तार के साथ-साथ हजारों परिवारों के आशियाने और शिक्षा के इस मंदिर को बचा पाता है या नहीं।
