Friday, June 19, 2026
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पटना का नाम ‘पाटलिपुत्र’ करने की मुख्यमंत्री की घोषणा पर आंदोलन के पुरोधा डॉ. अनिल सुलभ ने दी बधाई

​मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की घोषणा से नगरवासियों और प्रबुद्ध नागरिकों में हर्ष की लहर।

​’पाटलिपुत्र जागरण अभियान समिति’ के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने मुख्यमंत्री को बधाई देते हुए जल्द कार्यान्वयन की मांग की।

​९वें दशक में पूर्व राज्यपाल मेजर जनरल एस. के. सिन्हा ने शुरू किया था यह ऐतिहासिक आंदोलन।

​आंदोलन के प्रभाव से पहले ही ‘पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र’ और ‘पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन’ अस्तित्व में आ चुके हैं।


पटना, १९ जून।

विगत १७ जून को फुलवारी शरीफ़ के एक आयोजन में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा पटना का नाम बदलकर ‘पाटलिपुत्र’ करने की ऐतिहासिक घोषणा का चौतरफा स्वागत हो रहा है। इस घोषणा से न केवल पटनावासी बल्कि बिहार के सभी सुबुद्ध नागरिक बेहद हर्षित हैं।

​इस सदी की शुरुआत में ‘पाटलिपुत्र जागरण अभियान समिति’ के तत्त्वावधान में इस मांग को लेकर एक बड़ा जन-आंदोलन चलाने वाले पुरोधा और समिति के अध्यक्ष डा. अनिल सुलभ ने इस निर्णय पर हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने अभियान समिति और पटना के नागरिकों की ओर से मुख्यमंत्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए इस घोषणा को शीघ्र धरातल पर उतारने का आग्रह किया है।

​मेजर जनरल एस. के. सिन्हा ने बोए थे आंदोलन के बीज

​मुख्यमंत्री को लिखे अपने बधाई और स्वागत पत्र में डा. सुलभ ने इस आंदोलन के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित किया। उन्होंने स्मरण दिलाया कि पूरे संसार में पहली बार किसी नगर के नाम-परिवर्तन का यह ऐतिहासिक आंदोलन पिछली सदी के ९वें दशक में सेना से अवकाश प्राप्त सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एस. के. सिन्हा ने आरम्भ किया था। उस समय भी इस मांग को व्यापक जनसमर्थन मिला था, लेकिन जनरल सिन्हा को राज्यपाल बना दिए जाने के कारण यह आंदोलन तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सका।

​डा. सुलभ ने पत्र में लिखा कि इस आंदोलन के बाद देश-दुनिया के कई शहरों और देशों के नाम बदले गए, यहाँ तक कि बिहार में ‘गया’ का नाम ‘गयाजी’ हुआ, लेकिन सबसे प्राचीन और स्वर्णिम इतिहास रखने वाला पटना अब तक ‘पाटलिपुत्र’ नहीं हो सका था। उन्होंने अपने प्रसिद्ध आलेख ‘कब आज़ाद होगा पाटलिपुत्र’ की प्रति भी मुख्यमंत्री को संलग्न की है।

​सर्वधर्म और सभी वर्गों का मिला था अभूतपूर्व समर्थन

​डा. सुलभ की अध्यक्षता में चले इस आंदोलन की गूंज पटना के सभागारों से लेकर नुक्कड़-नुक्कड़ तक थी। इस मांग को हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित सभी धर्मों, प्रबुद्ध जनों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और राजनेताओं का अभूतपूर्व समर्थन मिला था।

​इस मुहिम में त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, बिहार विधान परिषद के तत्कालीन सभापति प्रो. अरुण कुमार, पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. एस. एन. पी. सिन्हा, मगध विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’, बिहार अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष जनाब हारुन रशीद और कैथोलिक ऐसोशिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष श्री अनिल सेसिल साह जैसे दिग्गज शामिल थे। बाद में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री आर. एस. गवई ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था।

​सदन में मिला था आश्वासन, अब पूरा होने की आस

​इस ऐतिहासिक मांग को लेकर बिहार विधान परिषद में माननीय सदस्य श्री आज़ाद गाँधी ने एक संकल्प भी पेश किया था। उस समय सदन में उपस्थित कई प्रमुख मंत्रियों ने खड़े होकर यह आश्वासन दिया था कि पटना का विस्तार कर जो महानगर बनाया जा रहा है, उसका नाम ‘पाटलिपुत्र’ रखा जाएगा। इस आश्वासन के बाद संकल्प वापस ले लिया गया था।

आश्वासन देने वाले तत्कालीन मंत्रियों में शामिल थे:

​नन्द किशोर यादव (नागालैंड के वर्तमान राज्यपाल)

​प्रेम कुमार (बिहार विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष)

अश्विनी चौबे (पूर्व केंद्रीय मंत्री)

जनार्दन सिंह सिग्रिवाल (वर्तमान सांसद)

​सरकार के इसी आश्वासन के बाद समिति ने अपने आगे के कार्यक्रम स्थगित कर दिए थे और तब से इस फैसले की प्रतीक्षा की जा रही थी।

​आंदोलन की अब तक की उपलब्धियां

​भले ही मुख्य नगर का नाम बदलने में वक्त लगा, लेकिन इस जागृति-आंदोलन के दबाव के कारण ही नूतन परिसीमन में ‘पाटलिपुत्र लोक सभा क्षेत्र’ अस्तित्व में आया और शहर के एक नव-निर्मित भव्य रेलवे स्टेशन का नाम ‘पाटलिपुत्र जंक्शन’ रखा गया। अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की इस ताजा घोषणा के बाद नागरिकों को उम्मीद है कि इस प्राचीन और महान नगर को उसका वास्तविक और गौरवशाली नाम ‘पाटलिपुत्र’ वापस मिल जाएगा।

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