Tuesday, April 21, 2026
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बिहार: सुशासन के दावों के बीच ‘120 सेकंड’ का खौफ और राजनीति की कड़वी जुबान

राजेश सिन्हा

पटना। बिहार में सुरक्षा का माहौल अब आम आदमी के लिए एक सपना और अपराधियों के लिए एक खुला मैदान बनता जा रहा है। राजधानी पटना के रामकृष्ण नगर में दिनदहाड़े हुई लूट की वारदात ने न केवल पुलिसिया गश्त की पोल खोल दी है, बल्कि राज्य की गिरती कानून-व्यवस्था पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

2 मिनट का तांडव: जब पिस्टल की बट से ‘कानून’ को लहूलुहान किया गया

​रविवार की दोपहर, जब शहर अपनी सामान्य रफ्तार में था, तब रामकृष्ण नगर के घाना मोड़ स्थित ‘श्री लक्ष्मी अलंकार ज्वेलर्स’ में अपराधियों ने दुस्साहस की नई पटकथा लिखी। मात्र 120 सेकंड (2 मिनट) के भीतर 5 अपराधियों ने न केवल 20 लाख रुपये के गहनों पर हाथ साफ किया, बल्कि दुकानदार धनंजय कुमार के सिर पर पिस्टल की बट से प्रहार कर व्यवस्था को भी घायल कर दिया।

​अपराधियों की ‘प्लानिंग’ इतनी सटीक थी कि उन्होंने पहचान छिपाने के लिए बाइकों पर काला टेप लगाया और लूट के माल को ले जाने के लिए दुकान में ही रखे एक साधारण गमछे का इस्तेमाल किया। सरेआम हवाई फायरिंग करते हुए भागते अपराधियों ने यह संदेश दे दिया है कि उन्हें खाकी का रत्ती भर भी खौफ नहीं है।

प्रशांत किशोर का प्रहार: क्या ‘वोट’ की कीमत चुका रही है जनता?

​इस बढ़ते अपराध के बीच जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर का हालिया बयान घाव पर नमक छिड़कने जैसा है। उन्होंने बिहार की जनता को आईना दिखाते हुए कहा कि जब लोग अपना वोट 10-10 हजार रुपये में बेचेंगे, तो उन्हें ऐसी बदहाल परिस्थितियां झेलनी ही पड़ेंगी।

​उनका यह तर्क सीधे तौर पर जनता की राजनीतिक चेतना पर प्रहार करता है। क्या वाकई बिहार की जनता अपनी सुरक्षा की कीमत चुनाव के वक्त चंद रुपयों में तय कर रही है? या फिर यह राजनीतिक तंत्र की वह विफलता है, जो अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़कर दोष जनता के सिर मढ़ रही है?

महज ‘खानापूर्ति’ बनकर रह गया है सरकारी तंत्र

​महिलाओं के साथ दुष्कर्म, दिनदहाड़े लूट और सरेआम हत्या की खबरें अब अखबारों के कोनों में सिमटने वाली सामान्य घटनाएं बनती जा रही हैं। पुलिस की छानबीन और सीसीटीवी फुटेज खंगालने की प्रक्रिया ‘पुराने ढर्रे’ की खानापूर्ति प्रतीत होती है। स्थानीय ‘लाइनर’ की सक्रियता और अपराधियों का तीन दिनों तक बेखौफ रेकी करना यह बताता है कि अपराधियों का सूचना तंत्र सरकारी तंत्र से कहीं अधिक मजबूत और सक्रिय है।

निष्कर्ष: फिल्म जैसी त्रासदी, हकीकत जैसा दर्द

​बिहार के लिए अपराध अब किसी थ्रिलर फिल्म के सीन जैसा हो गया है, जहाँ अपराधी नायक की तरह आते हैं, वारदात को अंजाम देते हैं और हवा में गोलियां लहराते हुए ओझल हो जाते हैं। विडंबना यह है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के लिए यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है, जबकि धरातल पर यह आम आदमी का वो ‘दर्द’ है, जिसे वह हर सेकंड, हर मिनट महसूस कर रहा है।

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