पटना/बिहार: बिहार में एक के बाद एक बेटियों के साथ हो रही दरिंदगी ने राज्य के ‘सुशासन’ की जड़ों को हिला दिया है। जहानाबाद में नीट छात्रा के साथ हुई बर्बरता हो, छपरा-औरंगाबाद का कांड हो या अब बिहटा के पीजी हॉस्टल में इंजीनियरिंग छात्रा का सामूहिक बलात्कार—इन घटनाओं ने बिहार के आम जन को शर्मसार और हताश कर दिया है। लेकिन इस त्रासदी का सबसे डरावना पहलू वह ‘लीपा-पोती’ है, जो सरकारी संरक्षण में फल-फूल रही है।
सत्ता की चादर में दुबके ‘रसूखदार’ कुकर्मी
बिहार की जनता का गुस्सा आज सिर्फ अपराधियों पर नहीं, बल्कि सरकार में बैठे उन लोगों पर भी है जिनकी पक्षपातपूर्ण नीतियां अपराधियों के लिए ढाल बन गई हैं। आरोप है कि यदि कुकर्मी किसी मंत्री या विधायक का सगा-संबंधी हो, तो पूरी मशीनरी उसे बचाने में जुट जाती है।
सीआईडी और एसआईटी का खेल: जांच के नाम पर महीनों तक फाइलें घुमाई जाती हैं।
सीबीआई से भी मोहभंग: अब तो जनता का भरोसा इस हद तक टूट चुका है कि उन्हें लगता है कि सीबीआई भी पीड़ित को न्याय दिलाने के बजाय ‘रसूखदारों’ को क्लीन चिट देने का माध्यम मात्र बनकर रह गई है।
न्याय में जानबूझकर देरी: पोस्टमार्टम रिपोर्ट का तीन-तीन महीने तक न आना इस बात का प्रमाण है कि सिस्टम की रुचि न्याय दिलाने में नहीं, बल्कि सबूतों को धुंधला करने में है।
मनीष कश्यप का तंज: “जब वोट बेच दिया, तो सुरक्षा कैसी?”
इस पूरे घटनाक्रम पर जनसुराज के नेता मनीष कश्यप का बिहारवासियों पर किया गया तंज आज हर चौक-चौराहे पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कश्यप ने समाज को आईना दिखाते हुए कड़वा सच बोला है। उन्होंने कहा कि—
”जब जनता दस-दस हजार रुपये और शराब की बोतलों पर अपना मताधिकार बेच देती है, तो उसे सरकार से बेटियों की सुरक्षा पर सवाल पूछने का नैतिक अधिकार खो जाता है। बिके हुए वोटों से बनी सरकारें अपराधियों की हितैषी होती हैं, बेटियों की नहीं।”
यह बयान उन करोड़ों मतदाताओं के लिए एक चेतावनी है जो चुनाव के वक्त जाति और चंद पैसों के लालच में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का सौदा कर लेते हैं।
अब खामोशी नहीं, बदलाव की जरूरत
बिहार की बेटियों को ऐसे ही दरिंदे नोचते रहेंगे, अगर अपराधी ‘निर्भीक’ और सिस्टम ‘बिकाऊ’ रहेगा। अपराधियों में कानून का आतंक पैदा करने के लिए अब केवल भाषण नहीं, बल्कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए तत्काल फांसी जैसी सजा की जरूरत है।
क्या बिहार की जनता अब भी खामोश रहकर इस ‘कुकर्मी बचाओ अभियान’ को देखती रहेगी? या फिर मनीष कश्यप के उस तंज को गंभीरता से लेकर अपने मत की ताकत और अपनी बेटियों की इज्जत की कीमत समझेगी?
