नीट छात्रा कांड: सीबीआई की सुस्ती और सत्ता का मौन
महिला सुरक्षा के दावों की पोल खोलने के लिए पटना का नीट छात्रा मामला ही काफी है। पिछले तीन महीनों से यह कांड पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय पुलिस, सीआईडी और एसआईटी के बाद देश की सबसे भरोसेमंद जांच एजेंसी सीबीआई को जिम्मा सौंपा गया। लेकिन नतीजा क्या निकला? ‘ढाक के तीन पात’।
हैरानी और शर्मिंदगी की बात यह है कि तीन महीने बीत जाने के बावजूद सीबीआई इस मामले के एकमात्र गिरफ्तार आरोपी मनीष रंजन के विरुद्ध चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर पाई।
इसी ‘बेशर्म सुस्ती’ का फायदा उठाकर पॉक्सो कोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी। सवाल यह है कि जो केंद्र और राज्य की ‘डबल इंजन’ सरकार आज सड़क पर शोर मचा रही है, वह जांच एजेंसियों की इस विफलता पर चुप क्यों है?
अपराध का ‘नालंदा मॉडल’ और चयनात्मक संवेदना
सवाल उठना लाजिमी है कि आज सड़कों पर उतरी ये ‘संवेदनशील’ नेत्रियां उस वक्त कहां थीं, जब मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा में एक महिला के साथ सरेआम चौराहे पर दुष्कर्म का प्रयास किया गया और निर्भीक अपराधियों द्वारा उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दिया गया? क्या वह बिहार की बेटी नहीं थी?
इसी नालंदा में 15 दिन पहले एक नाबालिग लड़की के साथ हथियार के बल पर दरिंदगी हुई और इसे अपनी आंखों से देखने के बावजूद पीड़िता का पिता इसकी पुलिस में शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मजबूरन न्याय की उम्मीद न देख पीड़िता ने मौत को गले लगा लिया।
4-5 साल की मासूम साथ छपरा, दरभंगा और सारण में मासूमों से हुई दुष्कर्म की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बनती है, लेकिन एनडीए के इन महिला सुरक्षा प्रेमियों’ की जुबान पर ताले जड़े थे।
उत्तराखंड अपमान और दोहरी नैतिकता
सबसे तीखा सवाल बिहार की उन बेटियों की अस्मिता का है, जिसकी ‘कीमत’ उत्तराखंड के एक भाजपा नेता द्वारा खुलेआम लगाई गई थी। उस समय पटना की सड़कों पर यह हुजूम क्यों नहीं दिखा?
जब पूरे बिहार के स्वाभिमान को सरेबाजार नीलाम करने की कोशिश हुई, तब ये ‘घड़ियाली आंसू’ बहाने वाली महिलाएं कहां थीं? शम्भू गर्ल्स हॉस्टल कांड से लेकर मासूमों की हत्या तक, भाजपा की चुप्पी ही उसका असली चरित्र उजागर करती है।
निष्कर्ष: घर से शुरू हो नारी सम्मान
जिस दल के 42 से अधिक सांसदों और कई मंत्रियों-विधायकों पर महिला उत्पीड़न जैसे गंभीर मामले दर्ज हों, उसका महिला सुरक्षा की बात करना पूरी तरह बेमानी लगता है। यदि संवेदनाएं सच्ची हैं, तो इसकी शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए।
आज बिहार की जनता इन आंदोलनकारियों से पूछ रही है—यह मार्च न्याय के लिए है या अपनी राजनीतिक गुलामी को प्रमाणित करने के लिए?
सत्ता के मद में चूर इन नेताओं को याद रखना चाहिए कि सम्मान ‘चयनात्मक’ नहीं होता। बेटियों की अस्मिता पर राजनीति करना बंद कीजिए, क्योंकि जनता अब शोर और सच्चाई के बीच का अंतर बखूबी समझती है।
