राजेश सिन्हा
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही सत्ता में आने के लिए राज्य में सत्तासीन NDA गठबन्धन ने अनेक लोकलुभावन योजना लागू की। जिसमें 1 करोड़ 87 लाख महिलाओं को 10 10 हजार रुपए खाते में, 125 यूनिट मुफ्त बिजली, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में 400 से 1100 रूपये की बढ़ोतरी जैसी दर्जनों घोषणा, जिसमें मानदेय और भत्ता में बढ़ोतरी की गई।
जिससे राज्य कोष में 60000 करोड़ का भार बढ़ा और राज्य सरकार का 3 लाख 17 हजार करोड़ का बजट लड़खड़ा गया। और इस कारण राज्य सरकार को 3 अनुपूरक बजट लेनी पड़ी जिससे राज्य का बजट बढ़ कर 4 लाख 32 हजार हो गया।
इसके गंभीर परिणाम चुनाव के बाद फिर मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार को झेलना पड़ा। राज्य भर में चल रहे विकास कार्य के तहत निर्माण कार्य के लिए देय राशि लगभग 1 लाख करोड़ का भुगतान रुक गया है।
राज्य सरकार की मदद से देश विदेश में स्टूडेंट्स क्रेडिट कार्ड की मदद से शिक्षा ग्रहण कर रहे बिहार के 50 हजार से अधिक छात्र छात्राओं का भुगतान रुक गया है।
27 फरवरी को नए आदेश में वेतन, पेंशन, संविदाकर्मी के मानदेय और प्रतिबद्ध राशि की निकासी पर रोक लगा दी गई हैं। बहुप्रतीक्षित शिक्षक भर्ती की नोटिस पर रोक लगी हुई है।
सबसे गंभीर स्थिति राज्य सरकार के वित्त विभाग द्वारा गत 6 फरवरी को राज्य कोष से 1 करोड़ से अधिक राशि की निकासी पर रोक का आदेश है।
मतलब यह कहा जाए कि बिहार गंभीर आर्थिक संकट झेल रहा हैं। और राज्य के साथ केंद्र में सत्ताधारी NDA गठबन्धन का प्रमुख दल भाजपा सिर्फ इसमें अपना फायदा ढूंढने में मस्त है। उसका कोई क्रिया कलाप बिहार को आर्थिक संकट से निकालने वाला नहीं दिख रहा है।
मौका बना कर गत 15 अप्रैल को राज्य में सम्राट चौधरी के रूप में अपना मुख्यमंत्री तो बिठा दिया लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार का कार्य जान बूझकर लटका दिया है। भाजपा का शुरुवात से ही रवैया एन केन प्रकारेन सत्ता हासिल करना था। सत्ता प्राप्त करने के बाद भाजपा के रुख से बिहार की आर्थिक संकट, बिहार के विकास से जैसे उसे कोई लेना देना ही नहीं है।
राज्य में 145 दिन तक नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार चली, लेकिन उस दौरान भी कोई पूर्णकालिक वित्त मंत्री नहीं था नाही कोई पूर्णकालिक मुख्य वित्त सचिव बनाया गया। सबकुछ राम भरोसे चलता रहा। और राज्य में वित्तीय संकट गहराता गया।
अब मंत्रिमंडल विस्तार में केंद्रीय भाजपा नेतृत्व द्वारा देरी से एक बार फिर उनकी बिहार के प्रति अच्छी मंशा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। और इसका खामियाजा हर बिहार वासियों को भुगतना पड़ रहा हैं।
