बिहार की राजनीति इस समय पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर पूरी तरह गरमाई हुई है। इस सीट पर जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) खुद चुनावी मैदान में उतर चुके हैं, जिसके बाद मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय हो गया है।
लेकिन विपक्ष (विशेषकर राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद) आखिर क्यों नहीं चाहता कि इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत हो? और इसी प्रतिस्पर्धा मैं राजद ने अपने उम्मीदवार की भी घोषणा कर दी है और प्रचार भी जोर-शोर से शुरू हो गया है।
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है। कि जहां एक तरफ पूरे देश में भाजपा को घेरने के लिए पूरा विपक्ष लामबंद हो रहा है। वही बाकीपुर विधानसभा के उप चुनाव में देशभर में चर्चित चेहरा, प्रसिद्ध चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर खुद मैदान में है। और वहां से बिहार का सबसे प्रमुख विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल प्रशांत किशोर का समर्थन न करते हुए अपने दल से उम्मीदवार उतारा हैं।
इस बारे में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा कुछ भी हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसके कई कारण है राजद के पास जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर का विरोध करने के लिए। और इन्हीं सब कारणों का विश्लेषण एक-एक करके करना आवश्यक है।
- अतीत का ‘संदेह’ और भाजपा को परोक्ष लाभ की आशंका
प्रशांत किशोर भले ही पिछले तीन वर्षों से बिहार की सड़कों पर ‘जन सुराज’ अभियान चला रहे हैं, लेकिन विपक्ष के मन में उनके अतीत को लेकर गहरा अविश्वास है।
अतीत का ट्रैक रिकॉर्ड: वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की रणनीति के पीछे प्रशांत किशोर का व्यावसायिक दिमाग भी था।
विपक्ष का नैरेटिव: राजद और अन्य विपक्षी दलों का मानना है कि पीके की जमीनी सक्रियता और चुनावी त्रिकोण बनाने की नीति अंततः विपक्ष के “एंटी-इंकंबेंसी” (सत्ता-विरोधी) वोटों का बंटवारा करती है। विपक्ष इसे भाजपा को फायदा पहुंचाने वाली क्रोनोलॉजी के रूप में देखता है।
- विपक्षी एकजुटता में दरार और वोटों का बिखराव
पिछले विधानसभा चुनाव के अनुभवों से सबक लेते हुए राजद इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि गत विधानसभा चुनाव में PK ने पूरे चुनाव में मतदाताओं को दिग्भर्मित करने का काम किया, यानी राज्य भर में एनडीए गठबंधन के विरोध में भारी जनाक्रोश होने के बावजूद मतदाताओं को सत्ताधारी दल के विरोध में गोलबंद नहीं होने दिया।
एक तरफ जहां चुनाव के पूर्व महिला मतदाताओं को 10 10 हजार रुपये बाटना सत्ताधारियों की जीत का कारण बना। वही जनसुराज के प्रवर्तक प्रशांत किशोर का धुंआधार प्रचार ने मतदाताओं को सही विकल्प चुनने के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी। और परिणाम स्वरुप गत विधानसभा चुनाव में विपक्ष की करारी हार।
यह आम धारणा है कि किसी भी राज्य में कोई ‘तीसरा मोर्चा’ या मजबूत विकल्प मैदान में आता है, तो वह सत्ताधारी गठबंधन से ज्यादा मजबूत विपक्ष के वोट बैंक में सेंध लगाता है। विपक्ष का मानना है कि पीके की राजनीति ने पहले भी विपक्षी गठबंधन को पूरी तरह गोलबंद होने में बाधा पहुंचाई है।
- राजद और भाजपा को ‘एक ही तराजू’ में तौलना
राजद के पीके के प्रति कड़े रुख की एक बड़ी वजह प्रशांत किशोर के लगातार तीखे हमले हैं।
पीके का रुख: प्रशांत किशोर अपनी सभाओं में बिहार के पिछड़ेपन के लिए जितना जिम्मेदार भाजपा और जदयू की ‘डबल इंजन’ सरकार को मानते हैं, उतना ही दोषी वो राजद के 15 साल के शासनकाल को भी ठहराते रहे हैं।
राजद को यह बात नागवार गुजरती है कि खुद को ‘बदलाव का विकल्प’ बताने वाले पीके उन्हें सत्ताधारियों के बराबर ही खड़ा कर देते हैं, जिससे राजद का पारंपरिक वोट बैंक भ्रमित हो सकता है।
- ‘एकतरफा’ संवाद और अपरोक्ष समर्थन की मांग
विपक्ष का एक बड़ा आरोप यह भी है कि प्रशांत किशोर खुद को स्थापित करने वाले इस उपचुनाव के लिए विपक्ष से परोक्ष समर्थन की उम्मीद तो रखते हैं, लेकिन वे कभी भी औपचारिक राजनीतिक मर्यादा के तहत राजद या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क नहीं किया। उनके भाषणों में केवल जनता से सीधे संवाद और अपरोक्ष समर्थन की अपील की गई है, कही सीधे संपर्क या बातचीत का प्रयास नहीं दिखा। जिसे राष्ट्रीय जनता दल नेतृत्व उनके ‘अहंकार’ और ‘गैर-गंभीर’ राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं।
- सबसे बड़ा डर: ‘विपक्ष के नए चेहरे’ के रूप में पीके का उभार
यह बांकीपुर उपचुनाव का सबसे संवेदनशील और दूरगामी राजनीतिक पहलू है।
प्रतिष्ठा की जंग: बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गढ़ रही है। इस बेहद मजबूत शहरी गढ़ में यदि प्रशांत किशोर जीत दर्ज कर लेते हैं, तो यह न केवल भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका होगा, बल्कि इसका सबसे बड़ा नुकसान राजद को होगा।
वैकल्पिक विपक्ष का खतरा: वर्तमान में राजद बिहार विधानसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल है। लेकिन यदि पीके यहां से जीतते हैं, तो पूरे देश और बिहार में यह संदेश जाएगा कि भाजपा-जदयू को टक्कर देने वाला असली और प्रभावी चेहरा तेजस्वी यादव नहीं बल्कि प्रशांत किशोर हैं। और इससे 25 विधायक होने के बावजूद बिहार की राजनीति में राजद की साख और मुख्य विपक्षी दल होने का एकाधिकार (Monopoly) खतरे में पड़ जाएगा।
बांकीपुर उपचुनाव केवल एक सीट का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह बिहार के आगामी राजनीतिक नेतृत्व की दिशा तय करने वाला लिटमस टेस्ट बन चुका है। राजद द्वारा यहां से अपना उम्मीदवार (रेखा गुप्ता) उतारना इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि वे इस मुकाबले को सीधे तौर पर त्रिकोणीय रख सकें और पीके को ‘एकमात्र विकल्प’ बनने से रोक सकें।
