पटना: भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ (RTE Act) आज अपने क्रियान्वयन के महत्वपूर्ण पड़ाव पर है। जहाँ एक ओर यह अधिनियम वंचित वर्ग के बच्चों के लिए सुनहरे भविष्य के द्वार खोलता है, वहीं दूसरी ओर निजी विद्यालयों के लिए यह कई जटिलताओं और आर्थिक दबाव का कारण भी बन रहा है।
संवैधानिक नींव और प्रमुख प्रावधान
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को वर्ष 2002 में 86वें संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया था। इसे प्रभावी बनाने के लिए 1 अप्रैल 2010 से पूरे देश में RTE अधिनियम लागू किया गया।
इस कानून के तहत निजी स्कूलों में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) और वंचित वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षित की गई हैं। इसके अतिरिक्त, स्कूलों में शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।
निजी विद्यालयों के सामने खड़ी चुनौतियाँ
बिहार इंडिपेंडेंट प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन (बिपसा) के अध्यक्ष मनोरथ महाराज द्वारा साझा किए गए विश्लेषण के अनुसार, निजी विद्यालय इस मिशन में सहभागी तो हैं, लेकिन वे कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहे हैं:
आर्थिक संकट: सरकार द्वारा EWS छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति (Reimbursement) में देरी और कम प्रतिपूर्ति दर के कारण स्कूलों को भारी ‘प्रति छात्र घाटा’ उठाना पड़ रहा है।
प्रशासनिक बोझ: नियमों की जटिलता, बार-बार बदलते दिशा-निर्देश और पोर्टल से जुड़ी तकनीकी समस्याओं के कारण शिक्षकों का कीमती समय शिक्षण के बजाय कागजी कार्यवाही में अधिक व्यय हो रहा है।
स्वायत्तता में कमी: अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप और निरीक्षण के दबाव के कारण विद्यालयों की नवाचार करने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
EWS छात्रों का संघर्ष और समाधान
केवल आर्थिक सहायता ही काफी नहीं है; आरक्षित श्रेणी के बच्चों को निजी स्कूलों के परिवेश में ढलने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है:
सामाजिक और मानसिक दबाव: भाषा के अंतर और सांस्कृतिक भिन्नता के कारण ये बच्चे अक्सर हीन भावना या अलगाव महसूस करते हैं।
अभिभावकों की भूमिका: अशिक्षित अभिभावकों के पास सही मार्गदर्शन की कमी होती है, जिसके लिए ‘अभिभावक प्रशिक्षण’ और ‘ब्रिज कोर्स’ जैसे समाधानों की आवश्यकता है।
सुधार की आवश्यकता और भविष्य की राह
अधिनियम को अधिक प्रभावी बनाने के लिए 2019 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, जिसमें कक्षा 5 और 8 के लिए पुनः परीक्षा की व्यवस्था शुरू की गई। हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी कई क्षेत्रों में सुधार की गुंजाइश है:
नियमों का सरलीकरण: SOP को सरल बनाना और पारदर्शी प्रशासन सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
समयबद्ध भुगतान: निजी स्कूलों पर पड़ रहे वित्तीय बोझ को कम करने के लिए प्रतिपूर्ति का समय पर भुगतान आवश्यक है।
समावेशी वातावरण: EWS छात्रों के लिए विशेष परामर्श केंद्रों की स्थापना की जानी चाहिए।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम सामाजिक न्याय का एक सशक्त हथियार है। लेकिन जैसा कि मनोरथ महाराज (अध्यक्ष, बिपसा) का कहना है, इसकी पूर्ण सफलता सरकार और निजी विद्यालयों के बीच सहयोगात्मक समन्वय और नियमों की व्यावहारिकता पर टिकी है।
