Monday, July 20, 2026
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PK का चुनावी डेब्यू: बांकीपुर में भाजपा के छूटे पसीने, ‘कारोबारी’ के जाल में उलझा ‘कैडर’!

अजय कुमार

बिहार की सियासत का नया अखाड़ा बनी पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं रह गया है। यह सीट भाजपा का पारंपरिक और अभेद्य गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन इस बार जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) के खुद मैदान में उतरने से यहाँ के समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।

इस चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों—जीत किसी की भी हो—लेकिन एक बात साफ है: जनसुराज की रणनीति ने भाजपा के मजबूत किले में सेंध लगाकर उसकी नाक में दम कर दिया है। चुनाव जीतने के लिए भाजपा को अब अपने इस पारंपरिक गढ़ में भी ‘साम, दाम, दंड, भेद’ जैसे हर हथकंडे अपनाने पड़ रहे हैं।

“कार्यकर्ता बनाम कारोबारी”: नैरेटिव गढ़ने की मज़बूरी

बांकीपुर की राजनीति में इन दिनों भाजपा द्वारा एक नया सिद्धांत उछाला जा रहा है—“कार्यकर्ता बनाम कारोबारी”। प्रशांत किशोर की 96 करोड़ से अधिक की घोषित संपत्ति और उनके पेशेवर बैकग्राउंड को ढाल बनाकर भाजपा उन्हें एक “कारोबारी” साबित करने में जुटी है, जबकि अपने प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को एक “आम जमीनी कार्यकर्ता” के रूप में पेश कर रही है।

दोहरा मापदंड और हास्यास्पद दावेदारी:

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह नैरेटिव बेहद विरोधाभासी है। जब पार्टी अन्य चुनावों में अभिनेताओं, उद्योगपतियों, डॉक्टरों और बड़े रणनीतिकारों को टिकट देती है, तब यह “जमीनी कार्यकर्ता” का सिद्धांत कहाँ चला जाता है?
पूरे देश में विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि भाजपा में शामिल होते ही बड़े से बड़े दागी नेताओं को क्लीन चिट मिल जाती है।
अपराध, हत्या या अन्य गंभीर आरोपों से घिरे नेताओं या उनके परिजनों को टिकट देने में कतराने वाली पार्टियां जब एक पढ़े-लिखे, सफल पेशेवर को राजनीति में आते देखती हैं, तो तुरंत उसे “कारोबारी” घोषित कर देती हैं।

टिकट बदलने की नौबत: संगठन शक्ति पर सवाल?

बांकीपुर में भाजपा की घबराहट का सबसे बड़ा सबूत टिकट वितरण में हुआ हाई-वोल्टेज ड्रामा है। पहले भाजपा ने यहाँ से अभिषेक कुमार ‘बंटी’ को मैदान में उतारा था, लेकिन आंतरिक खींचतान और दबाव के कारण उन्हें नामांकन के ठीक बाद नाम वापस लेना पड़ा। इसके बाद आनंद-फानन में पार्टी को रणनीति बदलकर नया उम्मीदवार उतारना पड़ा।

बड़ा सवाल: अगर कोई विपक्षी उम्मीदवार वाकई इतना कमजोर है कि एक “कारोबारी” कहकर उसे नकारा जा सके, तो फिर वर्षों की संगठन शक्ति, लाखों कार्यकर्ताओं का कैडर और सत्ता की पूरी मशीनरी को एक अदद सीट बचाने के लिए अपनी रणनीति क्यों बदलनी पड़ रही है?

अंतिम दौर तक निरंतर प्रयास करने की चुनौती

प्रशांत किशोर ने बांकीपुर की गलियों में सघन जनसंपर्क और पदयात्राओं के जरिए शहरी मतदाताओं (विशेषकर कायस्थ, वैश्य और मध्यम वर्ग) के बीच अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी है। जनसुराज की इस आक्रामक जमीनी रणनीति का मुकाबला करने के लिए भाजपा को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है:

नेताओं का दलबदल: जनसुराज के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए चुनाव से ठीक पहले जनसुराज के कई स्थानीय चेहरों को भाजपा में शामिल कराया गया है।

प्रतिष्ठा की लड़ाई: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सहित एनडीए के तमाम दिग्गज नेता इस शहरी सीट पर लगातार कैंप करने को मजबूर हैं, जो यह दिखाता है कि लड़ाई अब एकतरफा नहीं रह गई है।

क्षमता पर टिकी जनता की नजर
लोकतंत्र में जनता किसी उम्मीदवार का पुराना पेशा नहीं, बल्कि उसकी काट, नीयत, क्षमता और काम करने का विजन देखती है। “कार्यकर्ता बनाम कारोबारी” का यह प्रायोजित नैरेटिव उसी दिन दम तोड़ देता है जब मतदाता यह पूछने लगते हैं कि राजनीतिक शुचिता और “चाल, चरित्र, चेहरा” के पैमाने हर उम्मीदवार के साथ बदल क्यों जाते हैं?

बांकीपुर का यह उपचुनाव परिणाम चाहे जिसके पक्ष में जाए, लेकिन इसने स्थापित राजनीतिक दलों को यह संदेश दे दिया है कि अब पारंपरिक गढ़ों में भी जनता को बंधक नहीं माना जा सकता। यहाँ मुकाबला अंतिम वोट की गिनती तक बेहद कड़ा और निरंतर संघर्ष वाला होने जा रहा है।

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