मानवता शर्मसार: पटना के पारस अस्पताल पर गंभीर आरोप, क्या जीवन बचाने वाले ही बन गए सौदागर?
पटना। बिहार की राजधानी के प्रतिष्ठित और कथित तौर पर सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले पारस अस्पताल से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने चिकित्सा सेवा और मानवीय संवेदनाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक पिता, जो अपने इकलौते बेटे की जान बचाने की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचा था, आज वहां के प्रबंधन पर विश्वासघात, धोखाधड़ी और अमानवीयता के गंभीर आरोप लगा रहा है।
मौत के बाद भी वसूली का खेल?
मृतक 15 वर्षीय युवक विशाल के परिजनों का आरोप रोंगटे खड़े कर देने वाला है। पिता का दावा है कि उनके बेटे की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने इस तथ्य को छुपाए रखा। परिजनों के अनुसार, अस्पताल ने किशोर को ‘कृत्रिम रूप से जिंदा’ बताकर इलाज के नाम पर करीब 2 लाख रुपये वसूल लिए। जब बेटा दुनिया छोड़ चुका था, तब अस्पताल की खिड़की पर रसीदें काटी जा रही थीं।
किडनी निकालने जैसे संगीन आरोप
यह मामला केवल आर्थिक शोषण तक सीमित नहीं है। पिता ने अस्पताल पर अंग तस्करी (किडनी निकालने) जैसी अत्यंत गंभीर और संदिग्ध गतिविधियों का आरोप लगाया है। परिजनों का कहना है कि उन्हें बच्चे से मिलने तक नहीं दिया गया, जिससे अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा होता है। क्या एक प्रतिष्ठित संस्थान के बंद कमरों में इलाज के नाम पर कोई खौफनाक खेल चल रहा था? यह अब जांच का विषय है।
न्याय की गुहार और प्रशासन की जिम्मेदारी
क्रिकेट के मैदान पर लगी एक चोट अस्पताल में ‘अपराध’ की भेंट चढ़ गई। इकलौते बेटे को खोने का गम और ऊपर से अस्पताल की यह कथित बर्बरता किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है।
“अगर रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे? यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक मरीज डॉक्टर पर करता है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप अनिवार्य:
इस घटना ने संबंधित प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल दाग दिए हैं। क्या पारस अस्पताल जैसे बड़े संस्थानों को जवाबदेही से छूट मिली हुई है? उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई ही पीड़ित परिवार को न्याय दिला सकती है और समाज में कानून का इकबाल कायम कर सकती है।
