पटना | 22 अप्रैल, 2026
एक तरफ बिहार एआई (AI) और ‘प्रगतिशील भारत’ की दौड़ में कदमताल करने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुरक्षा मानकों के अभाव में गरीब मजदूरों की जान जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है। ताजा मामला भागलपुर के कदवा थाना क्षेत्र का है, जहाँ शौचालय की टंकी (सेप्टिक टैंक) की शटरिंग खोलने उतरे तीन मजदूरों की दम घुटने से दर्दनाक मौत हो गई।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस घटना पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है और मृतकों के परिजनों को मुख्यमंत्री राहत कोष से 2-2 लाख रुपये का मुआवजा देने का एलान किया है। मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की है, लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर इन ‘मानव निर्मित’ मौतों का अंत कब होगा?
स्मृति में ताजा है वैशाली का जख्म
भागलपुर की यह घटना कोई इकलौता मामला नहीं है। अभी महज दो महीने पहले वैशाली जिले से एक ऐसी ही हृदयविदारक खबर आई थी, जहाँ सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान तीन सगे भाइयों की दम घुटने से मौत हो गई थी। वैशाली से भागलपुर तक की इन घटनाओं ने सुरक्षा प्रोटोकॉल और प्रशासनिक निगरानी की पोल खोल कर रख दी है।
एआई के दौर में ‘आदिम’ तरीके से काम क्यों?
एक डिजिटल होते समाज में जहाँ हम जटिल समस्याओं के समाधान के लिए तकनीक की बात करते हैं, वहां मजदूरों का बिना किसी मास्क, ऑक्सीजन सिलेंडर या सुरक्षा उपकरण के जहरीली गैसों से भरी टंकी में उतरना कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
मैकेनिकल सफाई का अभाव: सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद, कई क्षेत्रों में मशीनों के बजाय मैनुअल तरीके से टंकियों की सफाई और शटरिंग का काम हो रहा है।
जागरूकता और प्रशिक्षण की कमी: निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों को ‘साइलेंट किलर’ कही जाने वाली मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों के खतरे का अंदाजा नहीं होता।
जवाबदेही का शून्य होना: क्या मुआवजे का मरहम उन परिवारों के दर्द को भर सकता है जिन्होंने अपने कमाऊ सदस्यों को खो दिया? क्या उन ठेकेदारों या मकान मालिकों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने बिना सुरक्षा किट के मजदूरों को मौत के मुंह में धकेला?
बिहार जैसे राज्य में, जो श्रम शक्ति का केंद्र है, वहां मजदूरों की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित दिखती है। बार-बार होती ये “शर्मनाक” दुर्घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम वास्तव में प्रगति कर रहे हैं, या हमारा विकास केवल ऊपर की चमक-धमक तक सीमित है, जबकि जमीन के नीचे (टंकियों में) आज भी ‘मौत का तांडव’ जारी है।
