पटना, 22 अप्रैल: बिहार की सियासत में आगामी 24 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक होने जा रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली पहली भाजपा सरकार सदन में विश्वास मत (Floor Test) पेश करेगी। लेकिन इस शक्ति प्रदर्शन से पहले सम्राट चौधरी के एक दावे ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। मुख्यमंत्री ने संकेत दिया है कि विपक्ष के करीब 40 विधायक पाला बदलकर सरकार के पक्ष में आ सकते हैं।
वर्तमान 243 सदस्यीय विधानसभा में आंकड़ों का खेल बेहद दिलचस्प है। सत्तारूढ़ एनडीए के पास वर्तमान में 202 विधायक हैं (नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद भाजपा की एक सीट कम हुई है)। वहीं, विपक्ष के पास कुल जमा 41 विधायकों का ही संख्या बल बचा है।
ऐसे में सम्राट चौधरी का ’40 विधायकों’ वाला दावा कई बड़े सवाल खड़े करता है:
विपक्ष का पूर्ण सफाया? यदि विपक्ष के 41 में से 40 विधायक पाला बदलते हैं, तो विपक्ष पूरी तरह अस्तित्वहीन हो जाएगा।
जेडीयू में सेंध की आशंका? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष के पास उतने विधायक ही नहीं हैं जितने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में क्या मुख्यमंत्री की नजर अपने ही सहयोगी दल जेडीयू (JDU) के विधायकों पर है?
मिशन ‘एकला चलो’: यदि भाजपा 30 से 40 विधायकों को अपने पाले में करने में सफल रहती है, तो वह 88 की अपनी वर्तमान संख्या के साथ पूर्ण बहुमत के जादुई आंकड़े को पार कर जाएगी। इसका सीधा मतलब यह होगा कि भाजपा को भविष्य में जेडीयू या अन्य छोटे सहयोगियों की बैसाखी की जरूरत नहीं रहेगी।
राजद और कांग्रेस में हालिया राज्यसभा चुनाव के दौरान दिखी टूट ने विपक्ष को पहले ही कमजोर कर दिया है। यदि राजद के 25 विधायकों की संख्या में और गिरावट आती है, तो तेजस्वी यादव के ‘नेता प्रतिपक्ष’ के पद पर भी खतरा मंडरा सकता है।
नियमों का खेल: 2006 के संशोधित नियमों के अनुसार, अब नेता प्रतिपक्ष के लिए 10% संख्या बल की अनिवार्यता तो नहीं है, लेकिन सबसे बड़े दल का नेता होना जरूरी है। यदि राजद में बड़ी टूट होती है, तो सदन के भीतर नेता प्रतिपक्ष का पद विधानसभा अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर हो जाएगा।
सम्राट चौधरी की इस आक्रामक रणनीति ने एनडीए के भीतर छोटे दलों और विशेषकर जेडीयू के भीतर एक अनजाना डर पैदा कर दिया है। यदि भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आती है, तो गठबंधन के वर्तमान स्वरूप और ‘गठबंधन धर्म’ की प्रासंगिकता खत्म हो सकती है।
संविधान के मुताबिक, किसी भी दल से अलग होने के लिए दो-तिहाई सदस्यों का एक साथ टूटना अनिवार्य है, अन्यथा सदस्यता रद्द हो सकती है। हालांकि, बिहार विधानसभा का पिछला इतिहास बताता है कि सदस्यता खत्म करने की याचिकाओं पर निर्णय होने में लंबा समय लगता है, जिसका फायदा पाला बदलने वाले विधायक उठाते रहे हैं।
24 अप्रैल का विशेष सत्र केवल बहुमत साबित करने का मंच नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति की नई दिशा तय करेगा। क्या सम्राट चौधरी भाजपा को बिहार में ‘स्वतंत्र सत्ता’ के शिखर पर ले जाएंगे, या विपक्ष अपनी बची-खुची एकजुटता बचाने में सफल होगा? यह देखना दिलचस्प होगा।
