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Friday, October 30, 2026
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मूल भाजपाइयों को दरकिनार कर बिहार में भाजपा का सत्तासीन होना आत्मघाती

वर्षों के सत्तासंघर्ष के बाद गत 15 अप्रैल को बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने अपने दल का मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के रूप में बिठाने में सफलता प्राप्त की है। लेकिन मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के तरफ से एकमात्र सम्राट चौधरी का शपथ ग्रहण ने राज्य के साथ देश भर के भाजपाइयों में हताशा की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

भाजपा सूत्र ही ये बता रहे है कि भाजपा की बिहार में यह एकल नीति बंगाल एवं असम विधानसभा चुनाव परिणाम तक रहेगा। उसके बाद भाजपा केंद्रीय नेतृत्व यह फरमान देगा कि बिहार में भाजपा की तरफ से कौन कौन मंत्रिमंडल में शामिल होगा।

ज्ञात हो कि पहले ही भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने मूल भाजपा कैडर के नेताओं को दरकिनार कर पहले लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल और फिर नीतीश कुमार बाली जनता दल यूनाइटेड से होकर आठ वर्ष पहले भाजपा में आए सम्राट चौधरी को राज्य के मुख्यमंत्री जैसा महत्वपूर्ण कुर्सी सौंप दिया।

और नए मंत्रिमंडल में जदयू कोटे से दो उपमुख्यमंत्री के अलावा किसी भी दल के कोई सदस्यों को मंत्री पद की शपथ नहीं दिलाई गई है। जिससे बिहार भर के मूल भाजपा नेता और विधायको में हताशा का माहौल है।

भाजपा असम में हेमंत विश्वसरमा और पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ रही है। हेमंत विश्वशरमा जहां कांग्रेस पृष्ठभूमि से आते हैं वहीं शुभेंदु अधिकारी महज पांच साल पहले ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस पार्टी छोड़ कर भाजपा में प्रवेश किया है।

वरिष्ठ भाजपा सूत्र के अनुसार बिहार में मंत्रिमंडल का बंटवारा इन दो राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद ही होना निश्चित है। पार्टी नेतृत्व इन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद ही यह निश्चित करेगी की बिहार के मंत्रिमंडल में पार्टी कैडर के नेताओं को प्रमुखता दी जाए या फिर बाहर से आए नेताओं को।

अगर इन दो राज्यों में पार्टी को अच्छी सफ़लता मिलती हैं तो भाजपा नेतृत्व बिहार के मूल भाजपाइयों को दरकिनार कर पूरी बागडोर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हाथों में दे देगा। वे जिसे चाहे बिहार सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल करे जिसे चाहे दरकिनार कर दें।

लेकिन इन दो राज्यों में से किसी एक में भी अगर पार्टी की स्थिति डावाडोल होती है तो पार्टी नेतृत्व सीधे बैकफुट पर आ जाएगी। और फिर उन्हें मूल भाजपाइयों को मान सम्मान देना मजबूरी हो जाएगी। ऐसे में बिहार के भाजपा नेता और विधायको को संयमित ढंग से असम और पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम आने तक इंतजार करना ही एकमात्र विकल्प है।

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