सुल्तानगंज नगर परिषद गोलीकांड: जब फाइलें खून से सनीं और ‘सुशासन’ के दावों पर चलीं गोलिया
भागलपुर: बिहार में अपराध की बेलगाम रफ्तार अब उस मुकाम पर पहुँच गई है, जहाँ रक्षक और नियामक ही भक्षक के निशाने पर हैं।
मंगलवार को भागलपुर के सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में जो हुआ, वह महज़ एक ‘क्राइम बुलेटिन’ का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक रीढ़ पर अपराधियों का सीधा प्रहार है।
दिनदहाड़े कार्यपालक पदाधिकारी (EO) कृष्ण भूषण कुमार की हत्या और सभापति राज कुमार गुड्डू को सिर में गोली मारना यह साबित करता है कि अपराधियों के लिए सरकारी दफ्तर अब कोई वर्जित क्षेत्र (No-Go Zone) नहीं रहे।
सत्ता परिवर्तन और बढ़ता दुस्साहस
विडंबना देखिए कि राज्य की कमान अभी हाल ही में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हाथों में आई है, जिनके पास राज्य में 5 महीने पहले सरकार गठन के साथ गृह विभाग उनके पास रहा है।
बावजूद इसके, सत्ता के गलियारों में हुए बदलावों का असर सड़कों पर ‘खौफ’ के रूप में दिखने के बजाय अपराधियों के ‘हौसले’ के रूप में दिख रहा है।
सुल्तानगंज जैसी पवित्र और व्यस्त जगह पर, जहाँ प्रशासन की चौकसी चौबीस घंटे होनी चाहिए, वहाँ दफ्तर में घुसकर कत्लेआम मचाना सीधे तौर पर नई सरकार की कार्यशैली को चुनौती देना है।
घटना के तीन बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैं:
असुरक्षित प्रशासनिक तंत्र: यदि एक राजपत्रित अधिकारी अपने चैंबर में सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक पुलिस थानों और कचहरियों में जाने की हिम्मत कैसे जुटाएगा?
खुफिया तंत्र की विफलता: क्या स्थानीय पुलिस और इंटेलिजेंस को अपराधियों की इस बड़ी साजिश की भनक तक नहीं थी? हथियारों के साथ सरकारी परिसर में प्रवेश करना सुरक्षा घेरे की पोल खोलता है।
अपराध का बदलता पैटर्न: हाल के दिनों में पटना में ज्वेलरी लूट और मासूम बच्चियों के साथ बढ़ती हैवानियत यह संकेत दे रही है कि अपराधी अब ‘सेलेक्टिव’ नहीं बल्कि ‘कलेक्टिव’ अराजकता फैला रहे हैं।
क्या ‘अराजकता’ का पुनरागमन हो रहा है?
समाज के हर वर्ग में आज एक ही डर व्याप्त है—क्या बिहार फिर से उसी पुराने दौर की तरफ मुड़ रहा है? जब सरकारी कार्यालयों में गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देने लगे, तो निवेश, विकास और पर्यटन की बातें बेमानी लगने लगती हैं।
सुल्तानगंज की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘सुशासन’ शब्द अब केवल कागजों और भाषणों तक सीमित रह गया है; धरातल पर अपराधी अपना समानांतर शासन चला रहे हैं।
कड़ी कार्रवाई की दरकार
ईओ की मौत और सभापति की नाजुक हालत ने पूरे प्रशासनिक अमले को सदमे में डाल दिया है। यह समय केवल ‘शोक’ व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ‘खौफ’ का पलटवार करने का है।
यदि प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से अपराधियों के मन में कानून की धमक पैदा नहीं की, तो जनता का भरोसा इस व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा।
