भाजपा के पूर्व विधायक सतीश कुमार का धीरेंद्र शास्त्री पर बड़ा हमला, बोले- ‘स्वार्थ के लिए भगवान को भी जातियों में बांट रहे कथावाचक’
पटना: धार्मिक मंचों से दिए जाने वाले बयानों और आस्था के व्यवसायीकरण पर एक बार फिर तीखी सामाजिक व राजनीतिक बहस छिड़ गई है। प्रसिद्ध कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम) के भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के स्वरूप व लीलाओं को लेकर दिए गए एक बयान के बाद विवाद गहरा गया है।
इस पूरे मामले पर राघोपुर से भाजपा के पूर्व विधायक सतीश कुमार ने सोशल मीडिया के माध्यम से तीखा हमला बोलते हुए कथावाचकों की मंशा और समाज में बढ़ते अंधविश्वास पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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1. पंडित धीरेंद्र शास्त्री का बयान और बढ़ा विवाद
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया। इसमें वे भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के स्वरूपों और लीलाओं की तुलना करते नजर आए। उन्होंने भगवान कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा (टेढ़े स्वरूप) और गाय चराने जैसी लीलाओं पर कुछ ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन्हें कृष्ण भक्तों और समाज के एक बड़े वर्ग ने अपमानजनक और जातिगत संकीर्णता से प्रेरित माना।
यद्यपि विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने एक वीडियो जारी कर सफाई दी कि उन्होंने यह बात ब्रज की पारंपरिक उलाहना और भावुकता के भाव में कही थी और उनका उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं था। इसके लिए उन्होंने खेद भी व्यक्त किया, लेकिन तब तक इस मुद्दे ने एक व्यापक सामाजिक बहस का रूप ले लिया।
2. पूर्व विधायक सतीश कुमार का तीखा पलटवार
धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व विधायक सतीश कुमार ने कहा कि समाज को तोड़ने का काम अब कथावाचकों के मंचों से हो रहा है।
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सतीश कुमार ने अपने बयान में कहा:
“पहले इंसानों को धर्म के आधार पर बाँटा गया, फिर वर्णों में और उसके बाद जातियों में। धीरे-धीरे हर जाति की अपनी अलग पहचान और परंपराएँ बना दी गईं। और आज एक कथावाचक भगवान को भी जातियों में बाँटकर हमारा भगवान और तुम्हारा भगवान बताने लगे हैं।”
उन्होंने आगे सवाल उठाते हुए लिखा:
“ज़रा सोचिए, भगवान भी कभी जाति के आधार पर बँटते हैं क्या? भगवान तो सबके हैं। उनकी न कोई जाति है और न कोई ऊँच-नीच। धर्म हमें जोड़ने के लिए है, बाँटने के लिए नहीं। लेकिन कुछ कथावाचक अपने स्वार्थ और लोकप्रियता के लिए भगवान को भी जातियों में बाँटने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों के कारण धर्म बदनाम होता है और समाज में भेदभाव बढ़ता है।”
उन्होंने आम जनता से अपील करते हुए कहा कि पूजा-पाठ और भगवान में श्रद्धा जरूर रखें, लेकिन अंधविश्वास, पाखंड और इंसानियत को बांटने वाले विचारों से दूर रहकर अपनी बुद्धि व विवेक का इस्तेमाल करें।
3. सामाजिक और वैचारिक निहितार्थ
सतीश कुमार का यह बयान केवल एक कथावाचक पर टिप्पणी भर नहीं है, बल्कि यह वर्तमान समय में धार्मिक मंचों के बढ़ते प्रभाव और उनके जिम्मेदार उपयोग पर एक बड़ा आईना है:
आस्था बनाम जातिगत ध्रुवीकरण: भारतीय समाज में ईश्वर को सर्वव्यापी माना गया है। जब धार्मिक मंचों से अवतारों या आराध्य देवों को किसी विशेष वर्ग या जाति से जोड़कर पेश किया जाता है, तो इससे समाज में सामंजस्य की जगह वैमनस्य बढ़ता है।
कथावाचकों की सामाजिक जवाबदेही: आज के दौर में कथावाचकों के करोड़ों अनुयायी हैं। ऐसे में मंच से बोले गए हर शब्द का असर सीधे जनमानस पर पड़ता है। लोकप्रियता पाने के चक्कर में विवादित बयान देना धर्म की मूल भावना के विपरीत है।
अंधविश्वास पर प्रहार: राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र से जुड़े नेताओं द्वारा इस तरह खुलकर बोलना यह दिखाता है कि समाज का एक विचारशील वर्ग अब धर्म के नाम पर फैलाए जा रहे अंधविश्वास और विभाजनकारी विचारों के खिलाफ मुखर हो रहा है।
सतीश कुमार और धीरेंद्र शास्त्री से जुड़ा यह घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि भक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है। सच्ची भक्ति समाज में प्रेम, करुणा और समरसता बढ़ाती है, न कि ऊंच-नीच या जातियों की दीवारें खड़ी करती है। अंधविश्वास और पाखंड से परे जाकर इंसानियत और विवेक को प्राथमिकता देना ही एक स्वस्थ और जागरूक समाज की पहचान है।
