न्यायपालिका में हिंदी के प्रयोग पर आयोजित हुई संगोष्ठी
वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी की पुस्तक ‘मोमबत्ती से मशाल तक’ का हुआ लोकार्पण
50 वर्षों से अधिक समय से वकालत कर रहे 19 वरीय अधिवक्ताओं को मिला ‘अधिवक्ता-रत्न’ सम्मान
पटना, 6 जून। बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार ने कहा है कि हिंदी अवश्य ही देश की राष्ट्रभाषा बनेगी और इसे बनने से कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों को बल देने की आवश्यकता पर जोर दिया। श्री कुमार अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति, बिहार के तत्वावधान में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन और संगोष्ठी का उद्घाटन कर रहे थे।
विधानसभा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में कहा कि पटना उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पूर्ण पीठ (न्यायमूर्ति अमरेश्वर प्रताप सिंह, न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद) द्वारा याचिका संख्या-435/15 में 30 अप्रैल, 2019 को पारित न्यायिक आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना हर हाल में आवश्यक है। यह आदेश उच्च न्यायालय में हिंदी के प्रयोग को अनिवार्य बनाता है, जिसे राज्यपाल द्वारा 9 मई, 1972 को जारी अधिसूचना के आलोक में (संविधान के अनुच्छेद-348 के खंड-2 और राजभाषा अधिनियम-1963 की धारा-7 के तहत) पारित किया गया था।
लोकतंत्र में अधिवक्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण
प्रेम कुमार ने भारतीय लोकतंत्र और स्वतंत्रता आंदोलन में देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर जैसे महान अधिवक्ताओं के योगदान को याद करते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था में अधिवक्ता समाज एक अभिन्न अंग है और उनका कल्याण बेहद जरूरी है। इस अवसर पर उन्होंने सत्यप्रकाश तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक ‘मोमबत्ती से मशाल तक’ का लोकार्पण भी किया।
47 वर्ष बाद आया आदेश, फिर भी अनुपालन में देरी चिंताजनक
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता और साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 1972 में जारी अधिसूचना के संदर्भ में उच्च न्यायालय से आदेश आने में 47 वर्ष लग गए, और उसके बाद भी इसका सही तरीके से अनुपालन न होना दुखद है। उन्होंने कहा कि हिंदी से जुड़े सभी विवादों का एकमात्र समाधान यही है कि भारत अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी घोषित करे।
जनता की भाषा में मिले न्याय
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष व वरिष्ठ अधिवक्ता धर्मनाथ प्रसाद यादव ने कहा कि जब तक जनता की भाषा में न्याय नहीं मिलेगा, तब तक आम लोगों को वास्तविक न्याय की अनुभूति नहीं हो सकती। आज समाज का भरोसा न्यायपालिका पर टिका है, इसे अक्षुण्ण रखने के लिए हिंदी को अविलंब न्यायपालिका की भाषा बनाना होगा।
संगोष्ठी में पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश दामोदर प्रसाद, इंद्रदेव प्रसाद, रवींद्र राय, रणविजय सिंह, डॉ. मधुसूदन राय सहित कई विद्वानों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
19 वरीय अधिवक्ता ‘अधिवक्ता-रत्न’ से सम्मानित
समारोह के दौरान समाज और न्याय प्रणाली में 50 वर्षों से अधिक का समय देने वाले 19 वरीय अधिवक्ताओं को ‘अधिवक्ता-रत्न’ अलंकरण से विभूषित किया गया।
सम्मानित होने वालों में सर्वेश नारायण सिंह, विन्ध्य केशरी कुमार, डॉ. उमाशंकर प्रसाद, नागेंद्र प्रसाद सिंह और धर्मनाथ प्रसाद यादव सहित अन्य वरिष्ठ नाम शामिल हैं।
कार्यक्रम का संचालन पृथ्वीराज यदुवंशी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. ओम प्रकाश जमुआर द्वारा किया गया। इस मौके पर सैकड़ों की संख्या में विद्वान अधिवक्ता उपस्थित थे।
