Monday, August 24, 2026
Homeराजनीतिभोजपुर-बक्सर विधान परिषद उपचुनाव: परिवारवाद और अपनों की बगावत ने डुबोई जदयू...

भोजपुर-बक्सर विधान परिषद उपचुनाव: परिवारवाद और अपनों की बगावत ने डुबोई जदयू की लंका, राजद की बड़ी जीत

पटना | 14 मई, 2026

​भोजपुर-बक्सर स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव के नतीजों ने बिहार की सत्ताधारी राजनीति में खलबली मचा दी है। इस सीट पर मिली हार सिर्फ राजग (NDA) की शिकस्त नहीं है, बल्कि यह जदयू के भीतर सुलग रहे असंतोष और ‘परिवारवाद’ के खिलाफ उभरे गुस्से का परिणाम मानी जा रही है। मुख्य विपक्षी दल राजद के सोनू कुमार राय ने जदयू प्रत्याशी को हराकर इस सीट पर कब्जा जमा लिया है।

​परिवारवाद बना हार की मुख्य वजह?

​इस उपचुनाव में जदयू ने संदेश विधानसभा क्षेत्र से अपने विधायक राधा चरण शाह के पुत्र कन्हैया प्रसाद को मैदान में उतारा था। पार्टी के इस फैसले से संगठन के भीतर एक बड़ा खेमा नाराज था। कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं का आरोप था कि योग्य जमीनी नेताओं को दरकिनार कर ‘परिवारवाद’ को बढ़ावा दिया जा रहा है।

​इसी नाराजगी का नतीजा रहा कि जदयू के कद्दावर नेता मनोज कुमार उपाध्याय ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। हालांकि पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया, लेकिन वे ‘भोजपुर-बक्सर वार्ड महासंघ’ के समर्थन से निर्दलीय मैदान में डटे रहे।

​हार-जीत का गणित: बगावत ने कैसे बिगाड़ा खेल

​चुनाव के आंकड़े साफ तौर पर तस्दीक करते हैं कि अगर मनोज कुमार उपाध्याय ने बगावत न की होती, तो नतीजा कुछ और हो सकता था।

राजद की जीत का अंतर: 354 वोट

बागी मनोज उपाध्याय को मिले वोट: 657 वोट


विश्लेषण: जदयू समर्थित कन्हैया प्रसाद महज 354 वोटों से हारे हैं। वहीं, पार्टी से बागी हुए मनोज कुमार उपाध्याय को 657 वोट मिले। सीधा गणित यह है कि बागी उम्मीदवार ने जदयू के कोर वोट बैंक में इतनी बड़ी सेंध लगाई कि वह हार के अंतर से लगभग दोगुना रही। साफ है कि पार्टी के भीतर का विरोध ही कन्हैया प्रसाद की हार का सबसे बड़ा कारण बना।

निर्वाचन आयोग के आंकड़े
इस उपचुनाव में रिकॉर्ड 97.96 प्रतिशत मतदान हुआ था। कुल 6,086 मतदाताओं में से 3,254 महिला और 2,832 पुरुष मतदाता शामिल थे। भारी मतदान के बावजूद सत्ता पक्ष अपनी सीट बचाने में नाकाम रहा।

भोजपुर-बक्सर के इस नतीजे ने यह साबित कर दिया है कि स्थानीय निकाय के चुनावों में ‘अपनों’ की नाराजगी भारी पड़ सकती है। जदयू के लिए यह हार एक चेतावनी है कि परिवारवाद के मुद्दे पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी चुनावी गणित को पूरी तरह बिगाड़ सकती है।

यह भी पढ़े

अन्य खबरे