पटना: बिहार की सियासत में ‘गठबंधन धर्म’ और ‘राजनैतिक रसूख’ की बिसात पर अक्सर शह और मात का खेल चलता रहता है। ताजा घटनाक्रम बिहार विधान परिषद की उस एक खाली सीट को लेकर है, जिस पर भाजपा ने अपने पुराने वफादार और प्रदेश मुख्यालय प्रभारी सूर्य कुमार शर्मा को उम्मीदवार घोषित कर दिया है।
इस घोषणा के साथ ही उन तमाम कयासों पर विराम लग गया है, जिनमें माना जा रहा था कि यह सीट राष्ट्रीय लोक मोर्चा (पूर्व में रालोजद) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश के खाते में जा सकती है।
करीब पांच महीने पहले जब बिहार में नई सरकार का गठन हुआ, तब सबसे चौंकाने वाला नाम दीपक प्रकाश का था। उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक को सीधे मंत्रिमंडल में शामिल कर पंचायती राज्य मंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वह उस कैबिनेट के एकमात्र ऐसे सदस्य थे, जो शपथ लेते समय किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) के सदस्य नहीं थे।
संवैधानिक नियमों के अनुसार, पद पर बने रहने के लिए शपथ ग्रहण के छह महीने के भीतर निर्वाचित होना अनिवार्य है। और विधान परिषद की इस रिक्त सीट को उनके लिए ‘लाइफलाइन’ माना जा रहा था।
लेकिन भाजपा नेतृत्व ने सूर्य कुमार शर्मा के नाम पर मुहर लगाकर यह साफ कर दिया है कि वह सहयोगियों की ‘अत्यधिक महत्वाकांक्षा’ के आगे अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी नहीं करेगी।
उपेंद्र कुशवाहा: अवसरवाद बनाम वफादारी की राजनीति
उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक सफर उपलब्धियों से भरा रहा है, लेकिन उन पर ‘अवसरवादिता’ के आरोप भी कम नहीं लगे। 1985 में लोकदल से शुरुआत करने वाले कुशवाहा ने नीतीश कुमार के साथ लंबी पारी खेली, फिर अपनी पार्टी RLSP बनाई, केंद्रीय मंत्री बने।
पाला बदलकर UPA में गए और फिर JDU में वापसी की। फरवरी 2023 में एक बार फिर राहें जुदा कर उन्होंने ‘राष्ट्रीय लोक मोर्चा’ बनाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने इस बार कुशवाहा को ‘आईना’ दिखाने की कोशिश की है। बार-बार गठबंधन बदलने और दबाव की राजनीति करने वाले नेताओं को यह संदेश दिया गया है कि भाजपा महज ‘राजनैतिक मजबूरी’ में किसी की हर जायज-नाजायज मांग को पूरी नहीं करेगी।
सूर्य कुमार शर्मा को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं:
संगठन सर्वोपरि: मुख्यालय प्रभारी जैसे पर्दे के पीछे काम करने वाले वरिष्ठ कार्यकर्ता को सम्मान देकर कैडर को यह संदेश दिया है कि मेहनत का फल मिलता है।
सहयोगियों पर लगाम: एनडीए के भीतर छोटे दलों को उनकी जमीनी हकीकत और वफादारी के दायरे का एहसास कराया गया है।
इसे उपेंद्र कुशवाहा के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है, जो शायद अपनी ‘सौदेबाजी’ की शक्ति का सही आकलन करने में चूक गए।
बिहार की राजनीति में अति माहत्वकांक्षी नेताओं में सबसे अव्वल नामों में उमेश कुशवाहा का नाम आता है। उनका राजनीतिक जीवन नीतीश कुमार के छत्र छाया में शुरुआत हुई थी। नीतीश कुमार की शह पर ही वे विपक्ष के नेता बने थे। लेकिन जल्द ही उनका अतिमहत्वाकांक्षी स्वभाव नीतीश कुमार से भी अलग कर दिया।
