पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है। मुद्दा केवल एक पत्रकार के प्रवेश पर प्रतिबंध का नहीं, बल्कि भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र और संघी मूल्यों के टकराव का है। खबर है कि ‘झकास भारत’ यूट्यूब चैनल के संचालक और बिहार विधानसभा पत्रकार सलाहकार समिति के सदस्य रविकांत कश्यप को पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में प्रवेश करने से रोक दिया गया है।
बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के विरुद्ध सोशल मीडिया पर की गई एक टिप्पणी के आधार पर की गई है। लेकिन इस प्रतिबंध ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रविकांत कश्यप केवल एक पत्रकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के तृतीय वर्ष शिक्षित स्वयंसेवक भी हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि संघ की पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति बिना किसी ठोस आधार या बिना किसी आंतरिक वैचारिक समर्थन के इस तरह का मुखर विरोध नहीं करेगा।
क्या यह अनुशासन का उल्लंघन है, या फिर यह पार्टी के भीतर पनप रहे उस असंतोष की अभिव्यक्ति है जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है? संघ के संस्कारों में रचे-बसे पत्रकारों या कार्यकर्ताओं पर इस तरह का प्रतिबंध यह संकेत देता है कि पार्टी अब ‘संवाद’ के बजाय ‘दमन’ की राह पर है
इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की आंतरिक राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि:
क्या बिहार भाजपा में अब बाहर से आए नेताओं का वर्चस्व इतना बढ़ गया है कि पार्टी की अपनी ‘कैडर’ और संघी पृष्ठभूमि वाले लोगों का प्रभाव खत्म होता जा रहा है?
क्या पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है, जहाँ सवाल पूछने वाले अपनों को ही दरवाजे से बाहर कर दिया जाता
एक तरफ सरकार अपराधियों पर नकेल कसने और शराबबंदी की विफलता जैसे मुद्दों पर घिरी हुई है। राज्य में नशाखोरी और बेरोजगारी से युवा पीढ़ी जूझ रही है। ऐसे समय में जब पत्रकार सत्ता से सवाल करते हैं, तो उनकी आवाज को दबाना कहीं न कहीं लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार है।
मुख्यमंत्री द्वारा “एफिडेविट” जैसे शब्दों के उच्चारण पर किए गए कटाक्ष को लेकर बिहार के गौरव की भी चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि क्या ऐसे उदाहरणों से दूसरे राज्यों में बिहारियों की छवि प्रभावित नहीं होती?
“जिस जंगलराज का भय दिखाकर राजनीति की गई, क्या आज की स्थितियां उससे अलग हैं? लोकतंत्र में पत्रकारों की आवाज पर रोक लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।”
कल तक जो नारा “25 से 30 फिर से नीतीश” का था, वह अब बदलता नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर पुराने कार्यकर्ताओं और संघी विचारधारा के लोगों को हाशिए पर धकेलने का खामियाजा भविष्य में भुगतना पड़ सकता है। आज एक पत्रकार पर रोक लगी है, कल यह असंतोष किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शक्ल ले सकता है।
