छायावादी प्रवृत्तियों और मानवीय संवेदनाओं का संगम है ‘पत्थरों का शहर’: डॉ. अनिल सुलभ
पटना। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रांगण में रविवार को प्रख्यात कवि मृत्युंजय गोविंद के नवीन ग़ज़ल-संग्रह ‘पत्थरों का शहर’ का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने गोविंद की रचनाधर्मिता की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी ग़ज़लें छायावादी और उत्तर-छायावादी काव्य-प्रवृत्तियों के बेहद करीब हैं, जो पाठकों को एक अलौकिक रहस्य-लोक की यात्रा कराती हैं।
संवेदना और संघर्ष का काव्य
डॉ. सुलभ ने संग्रह की चर्चा करते हुए बताया कि इसमें संकलित 128 ‘गीत-गंधी’ ग़ज़लें जीवन के विभिन्न रंगों, समाज की कारुणिक वेदना और प्रेम की झंकार को समेटे हुए हैं। उन्होंने कहा, “गोविंद के पास जीवन के प्रति गहरी आस्था है, तो वहीं वे गिरते मूल्यों पर अपने सुकुमार शब्दों से कठोर प्रहार भी करते हैं।” उनके अनुसार, इन ग़ज़लों के अर्थ को समझने के लिए पाठकों को शाब्दिक संसार से ऊपर उठकर बौद्धिक धरातल पर उतरना होगा।
सरल भाषा, गूढ़ विचार
मुख्य अतिथि और राज्य उपभोक्ता आयोग (बिहार) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने पुस्तक का विमोचन करते हुए कहा कि ‘पत्थरों का शहर’ की भाषा अत्यंत सरल है, किंतु इसमें समाहित विचार बेहद गूढ़ और गहरे हैं। वहीं, साहित्य मंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने स्वागत भाषण में कहा कि आज के कंक्रीट के युग में जहाँ लोग ‘पत्थर दिल’ होते जा रहे हैं, वहाँ गोविंद की ग़ज़लें मानवीय करुणा और सामाजिक पीड़ा को मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं।
काव्य पाठ से सजी शाम
समारोह के दौरान कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कवि मृत्युंजय गोविंद ने स्वयं अपनी चुनिंदा ग़ज़लों का पाठ किया। इसके पश्चात आयोजित कवि-सम्मेलन में चंदा मिश्र की वाणी-वंदना के साथ शहर के कई दिग्गज साहित्यकारों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। काव्य पाठ करने वालों में मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’, प्रो. सुनील कुमार उपाध्याय, कुमार अनुपम, सुजाता मिश्र, अश्विनी कविराज प्रमुख रूप से शामिल थे:
मंच का सफल संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने किया और धन्यवाद ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर उर्मिला वर्मा, चंदा वर्मा, वंदना सिन्हा, प्रभात सिन्हा और बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।
