Wednesday, April 22, 2026
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बिहार भाजपा में ‘शह और मात’ का खेल: सम्राट चौधरी ने पलटा विजय सिन्हा का फैसला, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम पर उठे सवाल!

पटना | 21 अप्रैल, 2026

​बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर भी वर्चस्व की जंग और नीतिगत मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। ताजा मामला राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग से जुड़ा है, जहाँ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक बड़ा कदम उठाते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा के उस कड़े फैसले को पलट दिया है, जिसे विभाग में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लिया गया था।

क्या था विजय सिन्हा का ‘कठोर’ निर्णय?

​विगत फरवरी माह में जब विजय कुमार सिन्हा राजस्व मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, तब विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और कार्यशैली को लेकर उन्होंने सख्त रुख अख्तियार किया था। जब राजस्व कर्मी हड़ताल पर गए, तो उन्होंने इसे अनुशासनहीनता और जनता के कार्यों में बाधा मानते हुए 224 राजस्व कर्मियों को निलंबित करने का आदेश दिया था। इसके साथ ही 45 से अधिक अंचलाधिकारियों और राजस्व अधिकारियों पर भी गाज गिरी थी। राजनैतिक हलकों में इसे विभाग की सफाई के तौर पर देखा जा रहा था।

सम्राट सरकार का यू-टर्न: राहत या सियासत?

​मुख्यमंत्री की कमान संभालने के बाद सम्राट चौधरी ने अब इन सभी 224 कर्मियों का निलंबन रद्द करने का निर्देश जारी कर दिया है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अपर सचिव डॉ. महेंद्र पाल ने सभी जिलाधिकारियों को बहाली की प्रक्रिया शुरू करने का पत्र भी भेज दिया है।

​इस निर्णय को राजनीतिक विश्लेषक केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर ‘शह और मात’ के खेल के रूप में देख रहे हैं।

नेताओं की साख का सवाल: अपने ही दल के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री द्वारा लिए गए जनहितकारी निर्णय को मुख्यमंत्री द्वारा खारिज करना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।

भ्रष्टाचार पर नरम रुख?: विजय सिन्हा का कदम विभाग में फैले भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने की एक कोशिश माना जा रहा था। ऐसे में निलंबन वापसी से अब सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं कि क्या सम्राट चौधरी वोट बैंक या कर्मचारी संगठनों को साधने के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम से समझौता कर रहे हैं?


अधिकारियों में खुशी, जनता में रोष

​एक तरफ जहाँ कर्मचारी इस फैसले से खुश हैं और कामकाज पटरी पर लौटने की उम्मीद जता रहे हैं, वहीं आम जनता के बीच इस ‘वादाखिलाफी’ और ‘अंदरूनी कलह’ को लेकर तीखी प्रतिक्रिया है। लोगों का मानना है कि यदि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे या अनुशासनहीनता करने वाले कर्मियों को इसी तरह राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा, तो बिहार के राजस्व विभाग की सूरत कभी नहीं बदलेगी।

​सम्राट चौधरी के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नई सरकार की प्राथमिकताएं पूर्ववर्ती व्यवस्था से अलग हैं। लेकिन अपने ही दल के कद्दावर नेता के फैसले को पलटने से पैदा हुई यह ‘दरार’ आने वाले समय में बिहार भाजपा के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकती है। क्या यह फैसला केवल प्रशासनिक सुधार है या फिर पार्टी के भीतर अपनी धमक जमाने की एक कोशिश, यह आने वाला समय बताएगा।

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