Friday, April 3, 2026
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जाको राखे साइयां’ साबित हुई हकीकत: बागमती नदी में 25 महिलाओं से लदी नाव पलटी, 24 सकुशल,

शिवहर: शिवहर जिले के तरियानी में शुक्रवार को बागमती नदी की गोद में जो मंजर दिखा, वह किसी रोंगटे खड़े कर देने वाली फिल्म से कम नहीं था। 25 महिलाएं, एक छोटी नाव और उफनती नदी—हादसा इतना बड़ा था कि पूरा गांव दहल गया। लेकिन जब मौत सामने खड़ी हो और कुदरत को कुछ और ही मंजूर हो, तो करिश्मे होते हैं। इस घटना ने एक बार फिर चरितार्थ कर दिया कि— “डूबते को तिनके का सहारा और बचाने वाले के हाथ हजार।”

मौत के मुहाने से 24 जिंदगियों की वापसी
महादेवा घाट पर जब नाव पलटी, तो बागमती की लहरें 25 जिंदगियों को लीलने के लिए बेताब थीं। लेकिन वहां मौजूद स्थानीय नाविकों और ग्रामीणों ने अपनी जान की परवाह किए बिना पानी में छलांग लगा दी। यह सिर्फ एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं था, बल्कि इंसानियत और बहादुरी का वो मिसाल था जिसने 24 महिलाओं को मौत के जबड़े से खींच निकाला। इसे महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि ‘ईश्वरीय विधान’ ही कहा जाएगा कि इतने बड़े हादसे के बाद भी 24 परिवारों के आंगन सूने होने से बच गए।

मजबूरी की नाव और सिस्टम का ‘मझधार’
विश्लेषणात्मक नजरिए से देखें तो यह हादसा एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है। खुरपट्टी और महादेवा गांव की ये महिलाएं शौक के लिए नहीं, बल्कि पेट की आग बुझाने के लिए चारा और घास काटने नदी पार करती हैं।

पुल का अभाव: आज़ादी के दशकों बाद भी अगर 25 महिलाओं को एक छोटी नाव पर अपनी जान दांव पर लगानी पड़ रही है, तो यह विकास के दावों की पोल खोलता है।

क्षमत्ता से अधिक बोझ: अक्सर ग्रामीण इलाकों में नावों पर क्षमता से अधिक लोगों को बैठाया जाता है, जो ‘हादसे को दावत’ देने जैसा है। प्रशासन की अनदेखी यहाँ साफ़ झलकती है।

एक ‘गुलशन’ की तलाश और सिसकता परिवार
जहाँ 24 महिलाएं सुरक्षित बाहर आ गईं, वहीं इशा मोहम्मद की पत्नी गुलशन खातून (30) का अब तक पता न चलना इस जीत में एक गहरी टीस छोड़ गया है। रेस्क्यू टीम और स्थानीय लोग मशक्कत कर रहे हैं, लेकिन समय बीतने के साथ उम्मीदें धुंधली पड़ रही हैं। पूरा गांव बागमती के किनारे टकटकी लगाए बैठा है—शायद कोई और करिश्मा हो जाए।

यह घटना हमें सिखाती है कि कुदरत के सामने इंसान बौना है, लेकिन साहस और समय पर की गई मदद काल को भी टाल सकती है। हालांकि, हर बार ‘जाको राखे साइयां’ के भरोसे जान जोखिम में डालना समझदारी नहीं है। प्रशासन को घाटों पर सुरक्षा और यातायात के पुख्ता इंतजाम करने होंगे ताकि भविष्य में बागमती की लहरें फिर कभी ‘खूनी’ न साबित हों।

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