बिहार में ‘जनसहयोग’ या सिर्फ बयानबाजी का ढकोसला? दावों की चमक और नतीजों का अंधेरा:
बिहार में सत्ता के शीर्ष पर बैठे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार राज्य से भ्रष्टाचार और अपराध को जड़ से खत्म करने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। घोषणाओं की रफ्तार इतनी तेज है कि हर दिन एक नया संकल्प सामने आता है। लेकिन जब इन दावों को धरातल पर तौला जाता है, तो परिणाम शून्य या कहें कि नगण्य नजर आते हैं। रविवार को मुख्यमंत्री के गृह जिला मुंगेर में हुआ ‘पंचायत विकास दिवस’ का भव्य आयोजन इसी विरोधाभासी प्रशासनिक ढर्रे का एक ताजा उदाहरण है।
मुंगेर से हुंकार: क्या सिर्फ चेतावनी से सुधरेगा सिस्टम?
मुंगेर के टेटिया बंबर स्थित जगन्नाथ उच्च विद्यालय के मैदान में आयोजित भव्य समारोह में मुख्यमंत्री ने एक बार फिर अधिकारियों को कड़े लहजे में चेताया। उन्होंने साफ कहा कि “अगर अफसर 30 दिनों में जनता का काम पूरा नहीं करेंगे, तो कोई उन्हें बचा नहीं पाएगा।”
करोड़ों की विकास योजनाओं की सौगात और गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का यह ‘ब्लूप्रिंट’ सुनने में बेहद आकर्षक लगता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल मंचों से सरकारी बाबुओं को ‘डंडा चलाने’ की चेतावनी देने से बिहार की सुस्त और भ्रष्टाचार में डूबी प्रशासनिक मशीनरी को बदला जा सकता है?
जनसहयोग शिविर: 30 दिन की समयसीमा का सच
सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी मानी जाने वाली ‘जनसहयोग शिविर’ योजना पर नजर डालें, तो दावों और हकीकत का अंतर साफ नजर आता है। हर महीने दो बार पंचायत स्तर पर लगने वाले इन शिविरों का उद्देश्य था—आम नागरिकों की प्रशासनिक और रोजमर्रा की शिकायतों को सुनना और 30 दिनों के भीतर उनका अनिवार्य समाधान करना।
17 मई का पहला शिविर: राज्यभर की पंचायतों में पहला शिविर बड़े उत्साह के साथ आयोजित हुआ था।
समयसीमा पार, हिसाब गायब: इस पहले आयोजन को हुए एक महीने से अधिक (लगभग 40 दिन) का समय बीत चुका है। नियमानुसार, इस दौरान मिली शिकायतों का निपटारा हो जाना चाहिए था।
सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल: सरकार की तरफ से आज तक यह डेटा जारी क्यों नहीं किया गया कि पहले शिविर में कुल कितने आवेदन आए? उनमें से कितनों का निपटारा हुआ? और जिन अधिकारियों ने 30 दिनों में काम नहीं किया, उन पर क्या ‘सरकारी डंडा’ चला या वे फाइलों के पीछे सुरक्षित बच निकले?
नई कार्यपद्धति या महज राजनीतिक ढकोसला?
रविवार को जब मुख्यमंत्री अपने गृह जिले में खड़े होकर फिर से ’30 दिनों की समयसीमा’ और ‘लापरवाह अफसरों पर कार्रवाई’ की बात कर रहे थे, तो उनके पास पिछले महीने के दावों की सफलता का कोई रिपोर्ट कार्ड नहीं था।
जब तक पिछली घोषणाओं का ऑडिट (लेखा-जोखा) सार्वजनिक नहीं किया जाता, तब तक जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि: क्या यह सच में बिहार को अग्रणी राज्य बनाने की कोई नई कार्य पद्धति है, या फिर यह सिर्फ चुनावी/राजनीतिक बयानों का एक और नया ढकोसला है?
प्रशासनिक सुधार केवल मंचों से दी जाने वाली चेतावनियों से नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता से आते हैं। जब तक सरकार आंकड़ों के साथ यह साबित नहीं करती कि उसने जनता की शिकायतों को वाकई दूर किया है, तब तक ‘भ्रष्टाचार और अपराध मुक्त बिहार’ का दावा सिर्फ एक खोखला नारा ही बना रहेगा।
