कल गुरुवार को किशनगंज में कांग्रेस सेवा दल के एक धरने के दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद ने बिहार के डिग्री कॉलेजों में उर्दू शिक्षकों की बहाली और उर्दू विषय को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने उर्दू को देश की अपनी जुबान बताते हुए कहा:
”हिंदी और उर्दू हमारी जुबान हैं, जो हिंदुस्तान में पैदा हुई हैं। जबकि अंग्रेजी की तरह संस्कृत भी बाहर से आई भाषा है, यह हिंदुस्तान की जबान नहीं है।”
2. भाजपा प्रभारी विनोद तावड़े का करारा पलटवार
कांग्रेस सांसद के इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने इसे हाथों-हाथ लिया और बिहार भाजपा के प्रभारी विनोद तावड़े ने इस पर बेहद गंभीर वैचारिक और राजनीतिक सवाल खड़े किए। तावड़े ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साफ तौर पर कहा
सांस्कृतिक आधार पर चोट: संस्कृत भाषा केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और हमारी वैदिक सभ्यता का असली आधार है। इसे विदेशी बताना भारत की आत्मा का अपमान है।
कांग्रेस की मानसिकता का पर्दाफाश: सांसद जावेद का यह बयान कोई अनजानी भूल नहीं, बल्कि यह कांग्रेस की भारतीय संस्कृति, वेदों और प्राचीन सभ्यता के प्रति गहरे विरोध की मानसिकता को दर्शाता है।
तुष्टिकरण की राजनीति: किसी एक भाषा या वोटबैंक को खुश करने के लिए भारत की सबसे प्राचीन और समृद्ध जीवित भाषा (संस्कृत) को बाहरी बता देना, कांग्रेस की ‘जीवांत’ तुष्टिकरण की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है।
अक्षुण्ण और अडिग है संस्कृत: हजारों वर्षों के इतिहास में विदेशी आक्रांताओं और भारत-विरोधी ताकतों ने संस्कृत को मिटाने, इसे दूषित करने या दबाने के अनगिनत प्रयास किए। लेकिन संस्कृत आज भी अक्षुण्ण, पवित्र और अडिग खड़ी है। यह हमारी प्रगति, वैज्ञानिक पहचान और ब्रह्मांड की संचालक शक्ति ‘ॐ’ की ध्वनि के रूप में अनादि काल से मानवता का कल्याण कर रही है।
वैचारिक समीक्षा: बयान के पीछे की राजनीति और सच
एक समीक्षात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो डॉ. मोहम्मद जावेद का यह बयान ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और भाषाई दोनों ही पैमानों पर पूरी तरह तथ्यहीन और अज्ञानता से भरा हुआ प्रतीत होता है।।
