बांकीपुर में कायस्थों का गढ़ ढहाने उतरी प्रशांत किशोर की ‘जनसुराज’, क्या इस बार बदलेगा इतिहास?
पटना | 13 जुलाई 2026
पटना की धड़कन कही जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट (पूर्व में पटना वेस्ट) पर होने वाला उपचुनाव इस बार बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बनने जा रहा है। साल 2008 के परिसीमन के बाद वजूद में आई यह सीट हमेशा से भाजपा की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक रही है। उच्च शिक्षित और शहरी मतदाताओं वाली इस सीट को ‘कायस्थ बहुल’ माना जाता है, जहाँ पारंपरिक रूप से भाजपा का दबदबा रहा है। लेकिन प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जनसुराज की सक्रियता ने इस बार बांकीपुर की चुनावी बिसात पर नए समीकरण बिछा दिए हैं, जिससे दिग्गजों की नींद उड़ गई है।
1. ‘कायस्थों का गढ़’ और भाजपा का अभेद्य किला
बांकीपुर का इतिहास गवाह है कि यहाँ की जनता ने हमेशा से कायस्थ उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है। इस सीट पर अब तक 9 बार कायस्थ उम्मीदवारों ने परचम लहराया है।
इसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा, कृष्ण बल्लभ सहाय, जनसंघ के दिग्गज नेता ठाकुर प्रसाद, रणजीत सिन्हा और भाजपा के कद्दावर नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा शामिल हैं।
वर्तमान में भी इस सीट पर नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के पुत्र और भाजपा के दिग्गज नेता नितिन नवीन का मजबूत कब्जा रहा है, जिन्होंने लगातार कई बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया है।
गैर-कायस्थ उम्मीदवारों में केवल ब्राह्मण समुदाय से आने वाले सुनील मुखर्जी ही यहाँ से विधायक बनने में सफल रहे थे।
2. जहाँ धराशायी हो चुके हैं बड़े-बड़े सूरमा
बांकीपुर की राजनीतिक तासीर ऐसी है कि यहाँ लहरों के विपरीत जाकर चुनाव जीतना नामुमकिन रहा है और कई बड़े दिग्गजों को करारी हार का सामना करना पड़ा है:
ठाकुर प्रसाद (1980): जनसंघ के इतने बड़े नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के पिता ठाकुर प्रसाद भी इमरजेंसी के बाद 1980 के चुनाव में यहाँ तीसरे स्थान पर खिसक गए थे और उन्हें मात्र 15.93% वोट मिले थे।
राम कृपाल यादव (1990): आरजेडी के बड़े चेहरे और वर्तमान मंत्री राम कृपाल यादव को भी इस सीट के जातीय चक्रव्यूह और साख के आगे हार का स्वाद चखना पड़ा था।
लव सिन्हा (2020): पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘शॉटगन’ शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा को उतारकर कायस्थ कार्ड खेला था, लेकिन भाजपा के नितिन नवीन ने उन्हें करीब 40,000 वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी थी।
3. प्रशांत किशोर (जनसुराज) एंट्री: क्यों इस बार आसान नहीं है राह?
अब तक बांकीपुर का चुनाव ‘भाजपा बनाम अन्य’ होता था, जहाँ विपक्ष सिर्फ रस्म अदायगी के लिए लड़ता था। लेकिन इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर के मैदान में उतरने से खेल पूरी तरह पलट गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार लड़ाई ‘अपेक्षा के अनुरूप’ (Predictable) नहीं रहने वाली। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
शहरी वोटरों पर पकड़: बांकीपुर का वोटर पढ़ा-लिखा और जागरूक है। प्रशांत किशोर लगातार विकास, शिक्षा, रोजगार और ‘राइट टू रिकॉल’ जैसे मुद्दों को उठाकर इसी शहरी और साइलेंट वोटर वर्ग को टारगेट कर रहे हैं, जो पारंपरिक दलों से ऊब चुका है।
एंटी-इन्कंबेंसी और नए विकल्प की तलाश: लंबे समय से एक ही दल के कब्जे में रहने के कारण स्थानीय स्तर पर कुछ हद तक सत्ता-विरोधी लहर (Anti-incumbency) का फायदा जनसुराज को मिल सकता है। पीके का ‘बिहार में विकल्प’ का नारा युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रहा है।
जातीय समीकरणों में सेंधमारी: प्रशांत किशोर का चुनावी गणित जातियों के भीतर उप-जातियों और विकास पसंद लोगों का एक नया गठजोड़ तैयार कर रहा है। यदि जनसुराज यहाँ से किसी मजबूत, स्थानीय और बेदाग छवि वाले चेहरे को उतारती है, तो वह भाजपा के कोर वोटर बैंक में बड़ी सेंध लगा सकती है।
निष्कर्ष: कांटे की टक्कर तय है
साफ है कि बांकीपुर अब सिर्फ किसी एक पार्टी की बपौती या सिर्फ जातीय गोलबंदी के भरोसे जीती जाने वाली सीट नहीं रह गई है। प्रशांत किशोर की जमीनी रणनीति और आक्रामक कैंपेनिंग ने पारंपरिक दलों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। बांकीपुर का यह उपचुनाव इतिहास की पुरानी यादों (पारिवारिक विरासत) और नई उम्मीदों (जनसुराज के विकल्प) के बीच एक भीषण राजनीतिक संग्राम बनने जा रहा है, जहाँ जीत-हार का बेहद मामूली अंतर से होगा।
