Saturday, May 30, 2026
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“अब सबसे बड़ी ग़ज़ल हिन्दी में कही जाएगी”: बशीर बद्र को साहित्य सम्मेलन में दी गई श्रद्धांजलि

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुई प्रख्यात शायर डॉ. बशीर बद्र की शोक-सभा

  • इस वर्ष से उर्दू-हिन्दी की उम्दा शायरी के लिए दिया जाएगा ‘डा बशीर बद्र स्मृति-सम्मान’

पटना, 30 मई। “डॉ. बशीर बद्र इस दौर के सबसे बड़े शायर थे, जिनकी पंक्तियां आज उक्तियां बन चुकी हैं। वे हिन्दी के भी उतने ही हिमायती थे, जितने उर्दू के। अपने अंतिम साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि ‘अब सबसे बड़ी ग़ज़ल हिन्दी में लिखी जाएगी’।” ये उद्गार बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने व्यक्त किए। वे शनिवार को सम्मेलन भवन में प्रख्यात शायर डॉ. बशीर बद्र के निधन पर आयोजित एक विशेष शोक-सभा की अध्यक्षता कर रहे थे।

​डॉ. सुलभ ने एक बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि इसी वर्ष से सम्मेलन के महाधिवेशन में दिए जाने वाले सम्मानों में ‘डॉ. बशीर बद्र’ का नाम भी जुड़ जाएगा। उर्दू और हिन्दी में उम्दा शायरी के लिए हर साल किसी एक चुनिंदा शायर या कवि को ‘डॉ. बशीर बद्र स्मृति-सम्मान’ से नवाजा जाएगा।

​शायरी के माध्यम से समाज के बदलते मिजाज पर चोट

​शोक-सभा में डॉ. बद्र के कालजयी शेरों को याद किया गया। दंगाइयों पर चोट करने वाले उनके प्रसिद्ध शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में” का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनका अंदाज़-ए-बयां सबसे जुदा था।

​कोरोना काल में उनके जिस शेर की देश-दुनिया में सबसे ज्यादा चर्चा हुई, उसे उद्धृत करते हुए डॉ. सुलभ ने कहा:

“वो हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,

यह नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

​इस शेर में बदलते समाज की बेदिली को साफ देखा जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने डॉ. बद्र के मानवतावादी दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए उनके इस शेर के साथ अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की:

​”उजाले अपनी यादों को मेरे पास रहने दो,

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

​साहित्यिक जगत की प्रमुख हस्तियों ने व्यक्त किया शोक

​मशहूर शायर के निधन को साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बताते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रत्नेश्वर सिंह, श्रीकांत व्यास, कुमार अनुपम, एम. क्यू. जौहर, इंजीनियर अशोक कुमार, डॉ. कुन्दन लोहानी और प्रवीर कुमार पंकज सहित कई गणमान्य लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया।

​सभा के अंत में उपस्थित सभी साहित्यकारों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। ज्ञात हो कि गत 28 मई को 91 वर्ष की आयु में डॉ. बशीर बद्र का निधन हो गया था।

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