Thursday, April 23, 2026
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चुनावी खर्च का ब्याज चुकाने ‘कर्ज के जाल’ में फंसती जा रही बिहार सरकार – जनसुराज

पटना। बिहार की राजनीति में वित्तीय साख और कर्ज का मुद्दा अब चुनावी गलियारों से निकलकर गंभीर आर्थिक बहस का रूप ले चुका है। गुरुवार को जन सुराज पार्टी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्य की ‘डबल इंजन’ सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन के गंभीर आरोप लगाए। पार्टी का मुख्य तर्क है कि सरकार अपने पिछले कर्ज का ब्याज चुकाने और चुनावी वादों को पूरा करने के लिए ‘कर्ज के जाल’ (Debt Trap) में फंसती जा रही है।

​जन सुराज के प्रदेश प्रवक्ता विवेक कुमार ने दावा किया कि राज्य सरकार रिजर्व बैंक से 12,000 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने जा रही है।

वर्तमान स्थिति: बिहार पर पहले से ही करीब 3.70 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है।

चिंताजनक पहलू: पार्टी के अनुसार, बिहार का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) 12% के आसपास पहुँच गया है, जो कि वित्तीय सुरक्षा की मानक सीमा से काफी अधिक है। यदि यह आंकड़े सटीक हैं, तो यह राज्य की आर्थिक सेहत के लिए एक “अलार्मिंग” स्थिति है।

प्रेस नोट में सबसे तीखा प्रहार सरकार की लोकलुभावन नीतियों पर किया गया है। जन सुराज का आरोप है कि:

​चुनाव जीतने के लिए मुफ्त बिजली, वेतन वृद्धि और नकद हस्तांतरण जैसे वादे बिना किसी ठोस वित्तीय योजना के किए गए।

राज्य को सालाना 40,000 करोड़ रुपये केवल ब्याज के रूप में चुकाने पड़ रहे हैं। यानी बिहार की जनता का हर दिन 100 करोड़ रुपये बिना किसी विकास कार्य के केवल पुराने कर्ज की भरपाई में खर्च हो रहा है।

पार्टी के वरिष्ठ नेता कैप्टन राजीव ने इस संकट को ‘मानवीय अपराध’ करार दिया। उनके अनुसार, खजाना खाली होने का सीधा असर समाज के सबसे निचले पायदान पर पड़ रहा है:

कल्याणकारी योजनाएं: वृद्ध, विकलांग और गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाएं फंड की कमी के कारण ठप पड़ने की कगार पर हैं।

वेतन और शिक्षा: सरकारी कर्मचारियों को समय पर वेतन न मिलना और छात्रों को स्कॉलरशिप के पैसे न मिल पाना, प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है।

जन सुराज का यह हमला सीधे तौर पर बिहार की विकास दर के दावों को चुनौती देता है। पार्टी का मानना है कि ‘केंद्रीय सहायता’ के भरोसे राज्य को चलाना और आकस्मिक निधि (Contingency Fund) का इस्तेमाल चुनावी लाभ के लिए करना बिहार को आर्थिक दिवालियेपन की ओर ले जा रहा है।

​यह प्रेस कॉन्फ्रेंस स्पष्ट करती है कि आगामी राजनीतिक विमर्श में जन सुराज “सुशासन” के दावों को “आर्थिक आंकड़ों” के जरिए घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।

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