Wednesday, April 22, 2026
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बिहार: सम्राट चौधरी द्वारा विजय सिन्हा का कद छोटा करने का गेम फंसा, बैकफुट पर सरकार

पटना: बिहार की सियासत में इन दिनों ‘अपनों’ के बीच ही शह-मात का खेल दिलचस्प हो चला है। राजस्व कर्मचारियों के निलंबन और बहाली का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पूर्व राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा के बीच वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बन गया है।

कल तक विजय कुमार सिन्हा के जिस निर्णय को पलटने को सम्राट चौधरी का ‘मास्टरस्ट्रोक’ बताया जा रहा था, आज विभाग को उसी पर सफाई देते हुए ‘बैकफुट’ पर आना पड़ा है।

कल तक सरकारी महकमे में यह ढिंढोरा पीटा गया कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विजय कुमार सिन्हा के ‘कठोर’ फैसले को पलटते हुए 224 राजस्व कर्मियों को जीवनदान दे दिया। लेकिन जैसे ही भाजपा के भीतर इस ‘द्वेषपूर्ण’ प्रचार के खिलाफ आक्रोश भड़का, विभाग की भाषा रातों-रात बदल गई।

विवाद के तीखे बिंदु:

क्रेडिट की होड़: कल जिस फैसले को मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए “विजय सिन्हा बनाम सम्राट चौधरी” बनाया गया, आज उसे जिलाधिकारियों (DM) के सिर मढ़कर पल्ला झाड़ा जा रहा है।

अपमान की राजनीति: पहले विजय सिन्हा की सुरक्षा श्रेणी घटाना और फिर उनके विभागीय निर्णयों को सार्वजनिक रूप से ‘रद्द’ करने का प्रचार करना—क्या यह भाजपा के ही एक कद्दावर नेता को हाशिए पर धकेलने की सोची-समझी रणनीति है?

भ्रष्टाचार पर सवाल: जिन कर्मियों पर अनुशासनहीनता और कार्य में बाधा डालने के आरोप थे, उन्हें ‘जनगणना’ के नाम पर क्लिन चिट देना कहीं प्रशासनिक मिलीभगत तो नहीं?

आज जारी प्रेस विज्ञप्ति में विभाग ने बेहद सधे हुए शब्दों में विजय सिन्हा का बचाव किया (या कहें कि डैमेज कंट्रोल किया)। विभाग ने माना कि:

मंत्री की कोई भूमिका नहीं थी: निलंबन का आदेश विजय सिन्हा ने नहीं, बल्कि जिलाधिकारियों ने दिया था। (तो फिर कल इसे ‘मंत्री का आदेश पलटना’ क्यों प्रचारित किया गया?)

नियमों की दुहाई: बहाली किसी ‘सियासी दरियादिली’ के तहत नहीं, बल्कि जनगणना 2027 की तकनीकी अनिवार्यता के कारण की गई है।

सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि क्या सरकार के भीतर ही कुछ अधिकारी ‘आग लगाने’ का काम कर रहे हैं? कल विजय सिन्हा को ‘विलेन’ बनाकर पेश किया गया और आज जब दिल्ली तक आंच पहुंची, तो प्रशासन नियमों की किताब लेकर सामने आ गया।

यह पूरी घटना दर्शाती है कि बिहार सरकार में ‘ऑल इज नॉट वेल’ की स्थिति है। एक तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा है, तो दूसरी तरफ चुनावी और राष्ट्रीय कार्यों के दबाव में दागी चेहरों की वापसी। विजय सिन्हा को बार-बार निशाने पर लेना इस गठबंधन सरकार के भीतर की दरार को और गहरा कर सकता है।

क्या यह महज एक प्रशासनिक सुधार है या विजय सिन्हा के बढ़ते कद को रोकने की एक नाकाम कोशिश? फिलहाल, सरकार की इस ‘यू-टर्न’ वाली सफाई ने यह तो साफ कर दिया है कि सम्राट चौधरी के दरबार में फिलहाल ‘डैमेज कंट्रोल’ की ज्यादा जरूरत है।

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