Thursday, May 21, 2026
Homeबिहारसमीक्षा: 'सहयोग शिविर' योजना – जमीनी हकीकत में घोषणा हवा हवाई लगती...

समीक्षा: ‘सहयोग शिविर’ योजना – जमीनी हकीकत में घोषणा हवा हवाई लगती है

पटना | 01 मई, 2026

​बिहार सरकार ने हाल ही में ‘सहयोग शिविर’ योजना की घोषणा करते हुए इसे जन-शिकायतों के निवारण के लिए एक ‘क्रांतिकारी कदम’ बताया है। सरकार का दावा है कि अब पंचायत स्तर पर ही समस्याओं का समाधान होगा और वह भी महज 30 दिनों के भीतर।

लेकिन क्या बिहार का वर्तमान प्रशासनिक ढांचा इस महत्वाकांक्षी योजना का भार उठाने के लिए तैयार है? एक सूक्ष्म विश्लेषण करने पर सरकार के ये दावे धरातल पर कम और कागजों पर अधिक मजबूत नजर आते हैं।

​बिहार में कुल 38 जिले और 534 प्रखंड हैं, जिनके अंतर्गत 8,000 से अधिक पंचायतें आती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि प्रखंड स्तर पर पहले से ही अधिकारियों और कर्मचारियों की भारी किल्लत है।

एक-एक पंचायत सचिव या राजस्व कर्मचारी के पास तीन से चार पंचायतों का अतिरिक्त प्रभार है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कर्मचारी अपने नियमित कार्यों को छोड़कर हर महीने के पहले और तीसरे मंगलवार को पंचायतों में शिविर कैसे लगाएंगे?

​योजना की सबसे बड़ी विसंगति बिहार के पंचायत भवनों की स्थिति है। एक अनुमान के मुताबिक, राज्य की लगभग 40 प्रतिशत पंचायतों के पास अपना भवन ही नहीं है।

जब सरकार के पास बैठने के लिए निश्चित स्थान ही उपलब्ध नहीं है, तो ‘सहयोग शिविर’ खुले आसमान के नीचे लगेंगे या किसी के निजी दरवाजे पर? बिना बुनियादी ढांचे के ऐसी बड़ी योजना की घोषणा व्यावहारिक कम और लोकलुभावन अधिक लगती है।

​इससे पहले भी प्रखंड और थाना स्तर पर ‘जनता दरबार’ लगाने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि इन दरबारों में अधिकारियों की उपस्थिति हमेशा से बहस का विषय रही है।

आम जनता अक्सर यह शिकायत करती है कि आवेदन देने के बावजूद महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं होती। जब पुराने तंत्र में ही न्याय की गति धीमी है, तो नए ‘सहयोग शिविरों’ में 30 दिनों के भीतर समाधान की गारंटी किसी ‘चुनावी जुमले’ से कम नहीं लगती।

​सरकार का उद्देश्य बिचौलियों को खत्म करना है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी कार्यालयों में बिना ‘संपर्क’ के काम होना आज भी चुनौतीपूर्ण है।

पंचायत स्तर पर जहां राजनीतिक हस्तक्षेप और स्थानीय प्रभाव अधिक होता है, वहां छोटे कर्मचारियों पर दबाव बनाना और भी आसान होगा, जिससे भ्रष्टाचार के नए रास्ते खुल सकते हैं।

​निस्संदेह, सरकार की मंशा पंचायत स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने की हो सकती है, लेकिन प्रशासनिक रिक्तियों और बुनियादी ढांचे के अभाव में यह घोषणा ‘घोड़ा न घास, फिर भी दौड़ने का प्रयास’ जैसी लगती है।

यदि सरकार वास्तव में समाधान चाहती है, तो उसे शिविरों के आयोजन से पहले पंचायतों को संसाधन और कर्मचारियों की शक्ति प्रदान करनी होगी। फिलहाल, यह योजना हकीकत के धरातल पर ‘हवा हवाई’ ही नजर आती है।

यह भी पढ़े

अन्य खबरे