पटना, 11 अप्रैल: बिहार की राजनीति में जहां एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे और उनके दिल्ली प्रवास की चर्चाएं तेज हैं, वहीं दूसरी ओर ‘सुशासन बाबू’ ने जाते-जाते राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। बिहार सरकार ने राज्य के सरकारी चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस (Private Practice) पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी संकल्प के अनुसार, अब सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टर बाहर निजी क्लीनिक नहीं चला सकेंगे। यह आदेश नीतीश सरकार के ‘सात निश्चय-3’ के तहत लिया गया है, जिसका उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की 24×7 उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
स्वास्थ्य विभाग के सचिव लोकेश कुमार सिंह द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, यह रोक निम्नलिखित संवर्गों पर लागू होगी:
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग।
बिहार चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग (मेडिकल कॉलेजों के शिक्षक)।
इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (IGIC) के चिकित्सक।
IGIMS में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है।
निजी प्रैक्टिस पर रोक के बदले डॉक्टरों को ‘गैर व्यावसायिक भत्ता’ (Non-Practicing Allowance – NPA) दिया जाएगा। सरकार जल्द ही इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश और प्रोत्साहन राशि का खाका पेश करेगी। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई डॉक्टर इस नियम का उल्लंघन करता पाया गया, तो उस पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भासा) के महासचिव डॉ. अमिताभ ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे जनहित में बड़ा कदम बताया है। हालांकि, उन्होंने इसे प्रभावी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं:
भ्रष्टाचार का मुकदमा: डॉ. अमिताभ के अनुसार, उल्लंघन को ‘संज्ञेय अपराध’ माना जाए और दोषी डॉक्टरों पर निगरानी या EOU द्वारा रिश्वतखोरी का मुकदमा चलना चाहिए।
रिक्त पदों की भर्ती: उन्होंने कहा कि राज्य में डॉक्टरों के 16,000 स्वीकृत पदों में से लगभग 5,000 खाली हैं। सेवा में सुधार के लिए इन पदों को तुरंत भरा जाए और लंबित पदोन्नति (Promotions) दी जाए।
सीमित असर: डॉ. अमिताभ का मानना है कि इस रोक का असर केवल 20% डॉक्टरों पर पड़ेगा, लेकिन इससे सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार होगा।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार 13 अप्रैल को इस्तीफा दे सकते हैं। राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद और ‘1 अणे मार्ग’ से सामान की शिफ्टिंग के बीच इस आदेश को उनका ‘लास्ट मास्टरस्ट्रोक’ माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ने साफ संदेश दिया है कि सरकारी डॉक्टरों को अपना पूरा समय और ध्यान सरकारी अस्पतालों और गरीब मरीजों को देना होगा।
