Friday, April 3, 2026
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शराबबंदी के बावजूद जहरीली शराब से लगातार मौतें: “ऐसे निष्क्रिय कानून तुरंत हटाए राज्य सरकार” — जन सुराज

मोतिहारी/पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी के दावों के बीच मोतिहारी में हुई ताजा त्रासदी ने एक बार फिर राज्य की कानून व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहरीली शराब से हो रही लगातार मौतों पर कड़ा रुख अपनाते हुए जन सुराज ने नीतीश सरकार पर सीधा हमला बोला है।

जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने मोतिहारी के प्रभावित इलाकों और सदर अस्पताल का दौरा करने के बाद स्पष्ट कहा कि जो कानून जनता की जान बचाने के बजाय “मौत का कारण” बन जाए, उसे तुरंत हटा देना चाहिए।

​मोतिहारी के तुर्कोलिया और सदर अस्पताल में पीड़ितों का हाल जानने पहुंचे मनोज भारती ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा:

विफलता का दोहराव: “यह कोई पहली घटना नहीं है। 2023 में भी इसी मोतिहारी में जहरीली शराब से 44 लोगों की जान गई थी। अगर प्रशासन ने उस समय सबक लिया होता, तो आज फिर मातम नहीं पसरता।”

भ्रष्ट तंत्र का संरक्षण: जन सुराज का आरोप है कि शराबबंदी अब केवल कागजों पर है, जबकि धरातल पर पुलिस और माफियाओं की मिलीभगत से समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। प्रशासन लोगों को जहरीली शराब से बचाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

निष्क्रिय कानून हटाने की जोरदार मांग

​मनोज भारती ने बिहार सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को अपनी जिद छोड़नी चाहिए। उन्होंने मांग की:

“ऐसे निष्क्रिय कानून को तुरंत हटाया जाए जो सिर्फ भ्रष्टाचार और मौतों को बढ़ावा दे रहे हैं। शराबबंदी कानून अब जनहित का नहीं, बल्कि माफियाओं की कमाई का जरिया बन चुका है। बेवजह के कानूनों को ढोने से बेहतर है कि व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए।”

मोतिहारी की घटना ने प्रशासनिक मुस्तैदी के दावों की पोल खोल दी है। जन सुराज की मीडिया ब्रीफिंग में यह साफ किया गया कि प्रशासन अगर दुरुस्त होता, तो ऐसी घटनाएं बार-बार नहीं होतीं।

पीड़ितों की सुध: अस्पताल में भर्ती कई लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित हुई है, और कई परिवार अपने कमाने वाले सदस्यों को खो चुके हैं।

राजनीतिक दबाव: जन सुराज के इस कड़े रुख के बाद अब राज्य सरकार पर शराबबंदी की समीक्षा को लेकर दबाव और बढ़ गया है।

​जन सुराज का यह प्रहार नीतीश कुमार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना ‘शराबबंदी’ की बुनियादी विफलता की ओर इशारा करता है। सवाल यह है कि क्या सरकार मौतों का यह सिलसिला रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी या “निष्क्रिय कानून” की आड़ में ऐसी त्रासदियां जारी रहेंगी?

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