Tuesday, June 16, 2026
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पटना जंक्शन-दानापुर रूट पर AC बसों में खुली लूट: न फेयर चार्ट, न शिकायत नंबर; बिना टिकट वसूला जा रहा मनमाना किराया

पटना। बिहार सरकार के परिवहन विभाग द्वारा संचालित एयर कंडीशनर (AC) बस सेवा इन दिनों यात्रियों के लिए आरामदेह सफर के बजाय मानसिक प्रताड़ना और आर्थिक शोषण का केंद्र बन चुकी है। राजधानी पटना की सड़कों पर दौड़ने वाली इन तथाकथित ‘सरकारी’ बसों की जमीनी हकीकत यह है कि न तो यहां नियमों का कोई वजूद है और न ही कर्मचारियों के व्यवहार में कोई शालीनता। यह बस सेवा पूरी तरह से निजी ऑपरेटरों की मनमानी और अराजकता का शिकार हो चुकी है।

​बदसलूकी की हद: “टेंपो में बैठने वाले एसी बस में क्यों बैठते हो?”

​बस के भीतर यात्रियों को सबसे पहले कंडक्टरों के उदंड और अभद्र व्यवहार का सामना करना पड़ता है। आम नागरिकों और मध्यम वर्गीय यात्रियों को नीचा दिखाना यहां आम बात हो चुकी है। हद तो तब हो जाती है जब कंडक्टर यात्रियों पर तंज कसते हुए कहते हैं, “टेंपो में बैठने वाले एसी बस में क्यों बैठते हो?”

​सरकारी सेवा होने के बावजूद यात्रियों के साथ ऐसा सामंती और अपमानजनक व्यवहार परिवहन विभाग के दावों की पोल खोलता है।

​किराए में ‘लूट’ की अजीब दास्तान: 1 महीने में 30 से 40 रुपया

​पटना जंक्शन से दानापुर रेलवे स्टेशन के रूट पर यात्रा करने वाले लोग किराए की इस मनमानी से सबसे ज्यादा त्रस्त हैं। किराए में वृद्धि किसी नियम के तहत नहीं, बल्कि कंडक्टरों और चालकों की मर्जी से हो रही है:

पिछले वर्ष: किराया मात्र ₹25 था।

एक महीना पहले: इसे बढ़ाकर ₹30 किया गया।

10 दिन पहले: अचानक किराया ₹35 कर दिया गया।

वर्तमान स्थिति: अब सीधे ₹40 वसूला जा रहा है।

मिनिमम किराया ₹20, न देने पर सीधे बस से उतारा:

बस का न्यूनतम किराया जबरन ₹20 तय कर दिया गया है। यदि कोई यात्री कम दूरी के लिए जायज किराया देना चाहे या इस तानाशाही का विरोध करे, तो कंडक्टर उसे सीधे चलती बस से उतरने को कह देता है। अब तक ऐसे दर्जनों यात्रियों को बीच रास्ते में ही बस से उतारा जा चुका है।

​पारदर्शिता गायब: न फेयर चार्ट, न शिकायत नंबर

​लूट के इस खेल को सुचारू रूप से चलाने के लिए पूरी प्लानिंग की गई है:

कोई किराया सूची नहीं: बस के भीतर कहीं भी आधिकारिक फेयर चार्ट (किराया सूची) नहीं चिपकाई गई है, जिससे यात्री सही किराए का पता लगा सकें।

शिकायत नंबरों पर पोता गया रंग: यात्रियों की आवाज को दबाने के लिए बसों के भीतर लिखे हेल्पलाइन या शिकायत नंबरों को जानबूझकर मिटा दिया गया है, ताकि कोई उच्च अधिकारियों तक अपनी बात न पहुंचा सके।

बिना टिकट का खेल: कम दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों से किराया तो पूरा वसूल लिया जाता है, लेकिन मांगने पर भी उन्हें टिकट नहीं दिया जाता। यह न केवल यात्रियों के साथ धोखा है, बल्कि सीधे तौर पर सरकारी राजस्व की चोरी भी है।

कोई जांच नहीं: बस सेवा के शुरुआती दौर में विभिन्न स्थानों पर परिवहन सेवा के तरफ से यात्रियों से औचक टिकट जांच के लिए बस के अंदर और विभिन्न स्थानको पर टिकट जांच कंडक्टर कार्यरत थे जो यात्रियों से टिकट की जांच करते थे। अब प्रशासनिक मिली भगत से कहीं भी कोई टिकट जांच कंडक्टर कार्यरत नहीं है।

​’सरकारी’ के नाम पर निजी गुंडागर्दी?

​इन बसों में सफर करने के बाद किसी भी आम नागरिक को यह अहसास नहीं होता कि वह बिहार सरकार की परिवहन सेवा का लाभ ले रहा है।

न ड्रेस, न बैज: बस के ड्राइवर और कंडक्टर के लिए न तो कोई तय सरकारी ड्रेस कोड है और न ही कोई पहचान पत्र या बैज, जिससे यह साबित हो सके कि वे परिवहन विभाग के अधिकृत कर्मचारी हैं। साधारण कपड़ों में मौजूद इन कर्मियों का व्यवहार किसी पेशेवर स्टाफ जैसा नहीं, बल्कि सड़क छाप दबंगों जैसा होता है।

​परिवहन विभाग की कुंभकर्णी नींद

​बिहार सरकार एसी बस सेवा का ढिंढोरा तो पीटती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी कमान ऐसे तत्वों के हाथ में सौंप दी गई है जो सरकार की छवि को धूमिल कर रहे हैं। बिना किसी नियमावली और निगरानी के चल रही यह बस सेवा फिलहाल पटना के आम यात्रियों के लिए ‘महंगी आफत’ बन चुकी है। अब देखना यह है कि परिवहन विभाग इस खुली लूट और अभद्रता पर कब संज्ञान लेता है।

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