पटना। बिहार में शराबबंदी के दावों के बीच पूर्वी चंपारण में जहरीली शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर सियासी पारा गरमा दिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के राज्य सचिव रामनरेश पाण्डेय ने इस घटना के लिए सीधे तौर पर जिला प्रशासन और पुलिस को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में सत्ता और पुलिस के संरक्षण में अवैध शराब का काला कारोबार फल-फूल रहा है।
“गरीब बन रहे शिकार, होम डिलीवरी जारी”
भाकपा राज्य सचिव ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बिहार में शराबबंदी अपने मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटक चुकी है। उन्होंने कहा:
संरक्षण का खेल: पूरे प्रदेश में पुलिस की मिलीभगत से घर-घर शराब की होम डिलीवरी हो रही है।
मौतों का आंकड़ा: पिछले दस वर्षों में जहरीली शराब ने बिहार के एक हजार से अधिक लोगों की जान ली है, जबकि सैकड़ों लोग अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुके हैं।
प्रशासनिक विफलता: चुनाव के वक्त दिखावे के लिए भट्ठियां ध्वस्त की जाती हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे दोबारा धधकने लगती हैं। पुलिस तस्करों के बजाय पीने वाले गरीबों पर कार्रवाई कर रही है।
मुआवजे और उच्चस्तरीय जांच की मांग
पूर्वी चंपारण की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पाण्डेय ने बताया कि परीक्षण मांझी, हीरालाल कामत, प्रमोद कुमार और चंदू कुमार की मौत जहरीली शराब से हुई है, जबकि छह अन्य लोगों की आंखों की रोशनी चली गई है। भाकपा ने सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
मुआवजा: प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 50-50 लाख रुपये और दृष्टि खोने वाले व्यक्तियों को 25-25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए।
सख्त कार्रवाई: मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और शराब माफियाओं को संरक्षण देने वाले पुलिस अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
जवाबदेही: पिछले 10 वर्षों में शराब पीने के आरोप में जेल भेजे गए 16 लाख लोगों के भविष्य और शराबबंदी की विफलता पर सरकार जवाब दे।
अराजकता का माहौल
रामनरेश पाण्डेय ने अंत में कहा कि जहरीली शराब की कीमत बिहार का गरीब अपनी जान देकर चुका रहा है। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि शराबबंदी को केवल कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर सख्ती से लागू किया जाए और अवैध कारोबारियों की कमर तोड़ी जाए।
