पटना
बिहार के सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब कार्रवाई का खौफ भी बेअसर साबित हो रहा है। आलम यह है कि सरकारी सिस्टम में बैठे ‘बाबू’ इतने ढीठ हो चुके हैं कि वे रिश्वत लेना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगे हैं। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की निरंतर छापेमारी और गिरफ्तारियों के बावजूद, भ्रष्टाचार की रफ्तार थमने के बजाय चार गुना तेजी से बढ़ रही है।
आंकड़ों की गवाही: 2 महीने में 28 गिरफ्तारियां
निगरानी ब्यूरो द्वारा जारी ताजा आंकड़े सिस्टम की सड़न को साफ बयां कर रहे हैं। साल 2026 के शुरुआती दो महीनों (जनवरी और फरवरी) में ही 28 लोक सेवकों पर भ्रष्टाचार के केस दर्ज किए गए हैं। यह पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 4 गुना अधिक है।
- 2025 (जनवरी-फरवरी): मात्र 7 केस दर्ज हुए थे।
- 2026 (जनवरी-फरवरी): आंकड़ा बढ़कर 28 पर पहुँच गया।
हैरानी की बात यह है कि जहाँ पिछले 25 वर्षों का औसत हर साल केवल 72 केस का था, वहीं इस साल के शुरुआती रुझान बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार का ग्राफ सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है।
रिश्वतखोरी की ‘भयानक’ रफ्तार
निगरानी के डीजी जितेंद्र सिंह गंगवार ने खुलासा किया कि जहाँ पहले औसतन हर महीने 6 भ्रष्टाचारी पकड़े जाते थे, वहीं अब यह औसत बढ़कर 14 केस प्रति माह तक पहुँच गया है। इन दो महीनों की कार्रवाई में अब तक 7 लाख 99 हजार रुपये नकद बरामद किए जा चुके हैं। ये मामले मुख्य रूप से:
- ट्रैप केस: रंगे हाथों रिश्वत लेते हुए पकड़ना।
- DA केस: आय से अधिक संपत्ति अर्जित करना।
अब ‘स्पीडी ट्रायल’ से होगा प्रहार
भ्रष्टाचारियों के दुस्साहस को देखते हुए अब विभाग ने अपनी रणनीति बदली है। निगरानी ब्यूरो ने इस वर्ष 200 मामलों का स्पीडी ट्रायल कराने का लक्ष्य रखा है ताकि भ्रष्ट अधिकारियों को जल्द से जल्द सजा दिलाकर जेल भेजा जा सके। साल 2025 में जहाँ 30 मामलों में सजा हुई थी, वहीं 2026 के शुरुआती दो महीनों में ही 4 मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है।
निगरानी ब्यूरो की यह सक्रियता सराहनीय है, लेकिन सवाल वही खड़ा है—क्या सलाखों के पीछे जाने का डर इन ‘बाबुओं’ की ढिठाई को कम कर पाएगा? जब तक सिस्टम के भीतर बैठे इन सफेदपोशों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक “जीरो टॉलरेंस” की नीति एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
