Thursday, February 26, 2026
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बिहार में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ बनाम ‘पर्यावरण सुरक्षा’: क्या ‘जन विश्वास विधेयक 2026’ से खतरे में पड़ेगा हरित परिवेश?

पटना | 26 फरवरी, 2026बिहार विधानसभा में आज उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा प्रस्तुत ‘बिहार जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026’ पर मुहर लग गई।

सरकार का दावा है कि इससे निवेश बढ़ेगा, लेकिन पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर चिंता गहरा गई है कि नियमों में ढील और कारावास जैसे कड़े प्रावधानों को हटाने से बिहार के हरित परिवेश (Green Environment) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

सरकार का तर्क: निवेश को प्रोत्साहन और अनुपालन का बोझ कम करनाउपमुख्यमंत्री ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य सरकार ‘सात निश्चय पार्ट-3.0’ के तहत “समृद्ध उद्योग–सशक्त बिहार” की परिकल्पना को साकार करना चाहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों में होने वाली प्रक्रियागत और तकनीकी त्रुटियों के लिए अब जेल (कारावास) नहीं जाना होगा।

इन दंडात्मक प्रावधानों को अब केवल आर्थिक दंड या प्रशासनिक जुर्माने में बदल दिया गया है।

इसका उद्देश्य व्यवसायियों और उद्यमियों पर से ‘अनावश्यक अनुपालन बोझ’ को हटाना और राज्य में निवेश के अनुकूल वातावरण बनाना है।

चिंता का मुख्य केंद्र: हरित परिवेश पर मंडराता खतरा: भले ही यह कदम उद्योगों के लिए ‘राहत’ जैसा दिख रहा हो, लेकिन पर्यावरण के नजरिए से इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि:प्रदूषण नियंत्रण में आएगी शिथिलता: अब तक जेल जाने के डर से उद्योग कचरा प्रबंधन और उत्सर्जन मानकों (Emission Norms) का पालन करते थे। कारावास का डर हटने से बड़े औद्योगिक घराने केवल ‘आर्थिक जुर्माना’ भरकर नियमों का उल्लंघन जारी रख सकते हैं।

बिहार के वन क्षेत्र और जैव विविधता को नुकसान: औद्योगिक विस्तार के दौरान यदि प्रक्रियागत त्रुटियों (जैसे बिना अनुमति पेड़ काटना या जल स्रोतों को प्रदूषित करना) पर कड़े दंड की व्यवस्था नहीं रहेगी, तो बिहार के सीमित हरित क्षेत्र और उपजाऊ भूमि को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।

पर्यावरणीय अपराधों का ‘पूंजीकरण’: दंडात्मक प्रावधानों को नागरिक दायित्व या जुर्माने में बदलने का अर्थ यह निकल सकता है कि “पैसे दो और प्रदूषण करो”। यह नीति बिहार के ‘जल-जीवन-हरियाली’ मिशन के मूल उद्देश्यों से टकरा सकती है।

सरकार जहाँ एक ओर ‘समृद्ध उद्योग’ का सपना देख रही है, वहीं चुनौती यह है कि औद्योगिक क्रांति की इस दौड़ में बिहार का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पीछे न छूट जाए। यदि उद्योगों को केवल आर्थिक दंड के भरोसे छोड़ दिया गया, तो आने वाले समय में बिहार की हवा और पानी की शुद्धता को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।

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