Monday, February 23, 2026
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आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की देशभक्ति पर सवाल क्यों उठाया?

राहुल गांधी अक्सर अपने बयानों को लेकर सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन जब मामला देश की सीमाओं और सेना की गरिमा से जुड़ा हो, तब शब्दों की मर्यादा और जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है। यही कारण है कि 4 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इतनी स्पष्टता से राहुल गांधी की “देशभक्ति” पर सवाल उठाया — जो न केवल एक कानूनी फटकार थी, बल्कि उससे अधिक एक नैतिक चेतावनी भी।

मामला क्या है – संक्षेप में पृष्ठभूमि

16 दिसंबर 2022: भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने कहा — “चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं। सरकार कुछ नहीं कर रही। चीन ने 2000 वर्ग किमी भारतीय जमीन पर कब्जा कर लिया है।”

यह बयान एक सेना विरोधी और राष्ट्रहित के विपरीत वक्तव्य के रूप में देखा गया, विशेष रूप से तब जब भारतीय सेना ने 12 दिसंबर 2022 को आधिकारिक तौर पर दावा किया था कि उन्होंने चीनी सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया।

पूर्व BRO डायरेक्टर उदय शंकर श्रीवास्तव ने लखनऊ की MP/MLA कोर्ट में मानहानि की आपराधिक शिकायत दर्ज कर दी।

मामला हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां फरवरी 2025 में समन जारी हुआ और मई 2025 में हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?

 “अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो ऐसी बात नहीं कह सकते।”

यह टिप्पणी भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किसी राजनीतिक नेता की देशभक्ति पर सार्वजनिक सवाल उठाने की दुर्लभ मिसाल है। अदालत ने सवाल उठाया:

“क्या आपके पास कोई साक्ष्य है कि चीन ने 2000 किमी ज़मीन हड़पी है?”

“क्या आप वहां थे?”

“ऐसा बयान देना क्या राष्ट्रहित में है?”

यह सवाल दरअसल सिर्फ राहुल गांधी से नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग से है कि राष्ट्रसुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर बयानबाजी क्या सच में जिम्मेदारी से की जाती है?

न्यायपालिका और विपक्ष की सीमाएं – एक संतुलन

राहुल गांधी के वकील अभिषेक मनु सिंघवी का तर्क था कि नेता प्रतिपक्ष होने के नाते राहुल को सरकार की नीतियों की आलोचना करने का अधिकार है। पर कोर्ट ने इसका जवाब सीधे और सटीक दिया —
“फिर यह संसद में क्यों नहीं कहते? सोशल मीडिया पर इस तरह की बातें क्यों?”

इस जवाब से यह स्पष्ट होता है कि संविधान प्रदत्त “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” भी निरंकुश नहीं है। जब कोई सार्वजनिक प्रतिनिधि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों में बिना ठोस प्रमाण के बयान देता है, तो वह सिर्फ अपने राजनीतिक विरोधी पर हमला नहीं करता, बल्कि पूरी सेना, देशवासियों और लोकतंत्र की साख पर असर डालता है।

यह सिर्फ कानूनी मामला नहीं, राजनीतिक चेतावनी भी है

सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे पर तीन सप्ताह की अंतरिम रोक जरूर लगाई, लेकिन जो लहजा अपनाया, वह स्पष्ट रूप से बताता है कि यह “stay” कोई राहत नहीं बल्कि ‘संयम बरतने का निर्देश’ है।

यह संकेत है कि अदालतें राजनीतिक बयानों की जिम्मेदारी तय करने को अब ज्यादा गंभीरता से ले रही हैं।

कांग्रेस बनाम भाजपा – इस बहस का राजनीतिक असर

भाजपा ने इसे “राहुल की चीन-झुकाव नीति” कहकर भुनाया। अमित मालवीय ने यहां तक कह दिया कि “राहुल एक प्रमाणित राष्ट्रविरोधी हैं।”

कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताया।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जनता ऐसे बयानों से भ्रमित होती है? या यह राष्ट्रीय विमर्श को दिशा देने का प्रयास है?

बयानबाजी की आज़ादी बनाम राष्ट्रीय जिम्मेदारी

राहुल गांधी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई साधारण ‘फटकार’ नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र में एक नए विमर्श का आरंभ है:

यह सवाल आज सिर्फ राहुल गांधी से नहीं, हर राजनेता से पूछे जाने चाहिए — क्योंकि लोकतंत्र की ताकत सिर्फ बोलने की आज़ादी में नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वपूर्वक बोलने की क्षमता में है।

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