Saturday, April 11, 2026
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लालू प्रसाद की ‘लाठी रैली’: जब ‘तेल’ ने पिछड़ों की एकता को सुलगा दिया

हाल ही में राजद नेता तेजस्वी यादव नवादा पहुंचे, जहाँ उन्होंने सड़क दुर्घटना में दिवंगत हुए राजबल्लभ यादव के पुत्र को श्रद्धांजलि दी। राजबल्लभ यादव, जो राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रहे थे, आज भी क्षेत्रीय राजनीति में एक बड़ा नाम हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनकी पत्नी वर्तमान में जदयू से विधायक हैं और उन्होंने हालिया चुनाव में राजद प्रत्याशी को पटखनी दी थी।

राजनीति के इस बदलते घटनाक्रम के बीच, राजद के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने एक पुरानी याद साझा की है, जो लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक पतन और पिछड़ों के उनसे छिटकने की कहानी बयां करती है।

शिवानंद तिवारी बताते हैं कि साल 2003 में जब गांधी मैदान में ‘लाठी रैली’ (लाठी में तेल पियावन रैली) की घोषणा हुई थी, तब उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया था। उनका तर्क सीधा था—लोकतंत्र में ‘लाठी’ का प्रदर्शन संवाद की जगह भय पैदा करता है। लेकिन तत्कालीन नेतृत्व ने इस सलाह को अनसुना कर शक्ति प्रदर्शन का रास्ता चुना।

राजबल्लभ यादव का वह सटीक आकलन
रैली के कुछ दिनों बाद मुख्यमंत्री आवास पर शिवानंद तिवारी की मुलाकात राजबल्लभ यादव से हुई। जब तिवारी ने रैली के नफ़े-नुकसान पर सवाल किया, तो राजबल्लभ जी ने एक कड़वी सच्चाई साझा की:

“लाठी रैली से क्या हासिल हुआ यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन नुक़सान क्या हुआ यह बता सकता हूँ। जब हम यादवों ने लाठी उठायी, तो हमारे साथ जो अन्य कमज़ोर पिछड़ी जातियां थीं, वे डरकर हमसे अलग हो गईं।”

लालू यादव की प्रतिक्रिया: पतन की शुरुआत?
जब शिवानंद तिवारी ने राजबल्लभ यादव के इस फीडबैक को लालू प्रसाद के सामने रखा और समीक्षा बैठक की मांग की, तो लालू जी का जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा:
“ठीक हुआ, ये लोग बहुत फड़फड़ा रहे थे।”

शिवानंद तिवारी के अनुसार, लालू प्रसाद की राजनीतिक गिरावट की शुरुआत यहीं से हुई। मंडल कमीशन के बाद ऊँची जातियां पहले ही खिलाफ थीं, और कुर्मी-कोइरी जैसी मध्य जातियां कभी पूरी तरह साथ नहीं आईं। रही-सही कसर इस लाठी रैली ने पूरी कर दी, जिसने अति-पिछड़ों (EBC) को राजद से सदा के लिए दूर कर दिया।

तिवारी का यह विश्लेषण दर्शाता है कि कैसे एक ‘बाहुबली’ छवि और शक्ति प्रदर्शन की होड़ ने उस सामाजिक गठबंधन को तोड़ दिया जिसे ‘मंडल’ की लहर ने बनाया था। आज जब तेजस्वी यादव नवादा जाकर पुराने साथियों के घर संवेदना जता रहे हैं, तो यह बीते हुए उस गौरव और खोए हुए जनाधार को वापस पाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

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