पटना। बिहार विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने शुक्रवार को पटना स्थित अनुग्रह नारायण कॉलेज (A.N. College) में इतिहास विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन किया। यह संगोष्ठी “औपनिवेशिक, उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय संस्थान और भारत बोध” विषय पर आधारित थी, जिसमें डॉ. प्रेम कुमार ने मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित होकर पश्चिमी ज्ञान और भारतीय ऐतिहासिक चेतना के बीच के द्वंद पर महत्वपूर्ण विचार रखे।
🗣️ प्रमुख बातें: औपनिवेशिक विरासत को चुनौती
अपने उद्घाटन संबोधन में डॉ. प्रेम कुमार ने उत्तर-औपनिवेशिक विचारधारा की आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यद्यपि इस विचार ने उपनिवेशवाद की संरचनाओं को चुनौती दी है, फिर भी उपनिवेशवादी शासन का प्रभाव कई रूपों में आज भी विद्यमान है।
डॉ. प्रेम कुमार ने पश्चिमी ‘विकसित दुनिया’ द्वारा थोपे गए गैर-औपनिवेशिक मानदंडों को बिना भारतीय अनुभव समझे स्वीकार करने को भारत की ऐतिहासिक चेतना के साथ अन्याय बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि:
- यूरोपीय इतिहास-लेखन ने भारत को केवल पश्चिमी दृष्टि से परिभाषित करने का प्रयास किया, जबकि भारत की अपनी ऐतिहासिक अनुभूति, सांस्कृतिक स्मृतियाँ और अनुभव उससे बिल्कुल भिन्न हैं।
- भारतीय राष्ट्रवाद और उपनिवेश-विरोधी विचारधारा में सांस्कृतिक मान्यताओं, मूल्यों, परंपराओं और भारतीय जीवनदृष्टि का महत्वपूर्ण स्थान है।
💡 आधुनिकता बनाम सांस्कृतिक क्षरण
अध्यक्ष महोदय ने आधुनिकता और वैज्ञानिकता के दोहरे प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने माना कि इन तत्वों ने भारतीयों को नई सोच दी है, परंतु साथ ही सांस्कृतिक स्मृतियों के क्षरण की चुनौती भी खड़ी की है।
उन्होंने कहा कि उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिकोण हमें यह समझने का अवसर देता है कि नए आध्यात्मिक और बौद्धिक युग की ओर भारत का उभार स्वाभाविक है। यह दृष्टिकोण इस बात का आत्मविश्वास देता है कि भारत अपनी सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा पर आधारित एक विशिष्ट सभ्यतागत पहचान रखता है, जिसे पश्चिमी अवधारणाओं से नहीं आँका जा सकता।
