बिहार: पत्रकार पेंशन पर रोक, जदयू मंत्री मजबूर, पत्रकारों से मांगी मदद
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब और हास्यास्पद तमाशा देखने को मिल रहा है। राज्य में सत्ता के समीकरण क्या बदले, जदयू (JDU) के कद्दावर नेताओं और मंत्रियों की हैसियत किसी ‘विजिटिंग कार्ड’ जैसी होकर रह गई है, जिसे जेब में तो रखा जा सकता है पर उससे दरवाजे नहीं खुलते।
ताजा मामला बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का है। राज्य के वरिष्ठ पत्रकारों—सुभाष पांडेय, दयाशंकर तिवारी, अशोक मिश्रा, दीपक मिश्रा और अरुण कुमार पांडेय—की पेंशन पिछले दो महीनों से बिना किसी पूर्व सूचना या कारण के बंद कर दी गई है। जब अन्नदाताओं (पत्रकारों) के पेट पर लात पड़ने लगी, तो उन्होंने तय किया कि इस रहस्य से पर्दा उठाया जाए।
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जब मंत्री जी ने खुद अपनी ही लाचारी का ढिंढोरा पीट दिया!
सहमति बनने के बाद वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय ने सीधे विभाग के मंत्री श्रवण कुमार का दरवाजा खटखटाया। श्रवण कुमार जी कोई छोटे-मोटे नेता नहीं हैं; वे बिहार विधानसभा में जेडीयू विधायक दल के नेता हैं और राज्य के अति-महत्वपूर्ण ग्रामीण विकास विभाग के भी मंत्री हैं।
लेकिन जब पत्रकार महोदय ने अपनी फरियाद उनके सामने रखी, तो मंत्री जी ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर पत्रकारों के होश उड़ गए और सियासत में भूचाल आ गया।
मंत्री श्रवण कुमार ने बिना किसी लाग-लपेट के यह सनसनीखेज खुलासा कर डाला कि इस मामले में आप लोग मेरी मदद करें। सरकार बदलने के बाद हालात बदल गए हैं! विभाग के सचिव मनीष कुमार आदेशों को नहीं सुन रहे हैं। सरकार बदलने के बाद से हम जदयू वालों का प्रभाव कम हो गया है।
मंत्री जी खुद मांगने लगे मदद!
जरा इस विडंबना की पराकाष्ठा देखिए! जिस विभाग की कमान एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री के हाथ में हो, वही मंत्री अगर अपनी ही कुर्सी पर बैठकर अफसरों के सामने लाचार नजर आए, तो हंसी आए या रोना, यह तय करना मुश्किल है।
मंत्री महोदय ने अपनी इस बेबसी का रोना रोते-रोते आखिरकार पत्रकारों से ही मदद की गुहार लगा दी। यानी हालात यह हो गए हैं कि अब जनता की समस्या सुलझाने वाले मंत्री जी खुद अपनी समस्या सुलझाने के लिए पत्रकारों का मुंह ताक रहे हैं!
जदयू खेमे में छाई व्याकुलता
यह वाकया सिर्फ एक विभाग का नहीं है, बल्कि पूरे बिहार में जदयू के विधायकों, मंत्रियों और कार्यकर्ताओं की असलियत बयां कर रहा है। आज स्थिति यह है कि:
किसी भी विभाग में जदयू कार्यकर्ताओं और नेताओं की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं बचा है।
मंत्रियों के आदेशों को ठेंगा दिखाकर अधिकारी अपनी मनमानी चला रहे हैं।
पार्टी के भीतर अंदरखाने ‘व्याकुलता’ का पारा सातवें आसमान पर है।
अगर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद से जदयू नेताओं की यही दुर्दशा बरकरार रही, तो पार्टी के भीतर सुलग रहा यह असंतोष किसी भी दिन एक बड़े राजनीतिक विस्फोट का रूप ले सकता है। फिलहाल तो स्थिति यह है कि मंत्री जी कुर्सी पर बैठे हैं, पर उनकी हैसियत अपने ही महकमे में एक दर्शक जैसी हो गई है!
