पटना/बिहार: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और आम नागरिक के सबसे बड़े हथियार ‘सूचना का अधिकार’ (RTI) पर बिहार में ग्रहण लग चुका है। राज्य का सूचना आयुक्त कार्यालय और विभिन्न विभागों के लोक सूचना पदाधिकारी (PIO) अब जनता के सेवक नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाले ‘वेतनभोगी रक्षक’ बन चुके हैं।
ताजा जमीनी हकीकत यह है कि जहाँ एक ओर अधिकारी सरकारी खजाने से मोटा वेतन उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार की फाइलों को दबाने के लिए आरटीआई कार्यकर्ताओं का गला घोंटा जा रहा है।
मुफ्त की ‘वेतनखोरी’ और जवाबदेही से दूरी:
बिहार के अधिकांश सरकारी कार्यालयों में लोक सूचना पदाधिकारियों ने ‘सूचना न देना’ ही अपना धर्म मान लिया है। नियम के अनुसार किसी भी आवेदक द्वारा सूचना के अधिकार कानून के तहत किए गए आवेदन का 30 दिनों के भीतर जानकारी देने का प्रावधान है।
लेकिन यहाँ के लगभग सभी विभागों में आरटीआई आवेदन महीनों धूल फांकने के लिए छोड़ दिया जाता है। आवेदक द्वारा अपने आवेदन का ससमय जवाब नहीं पाकड़ जब वह प्रथम और द्वितीय अपील करता है तो, उसके बदले में भी आवेदक को कोई जवाब नहीं मिलता है। अनेक मामलों में तो संबंधित विभाग आवेदन ही गायब कर देता है और आवेदक को आपका आवेदन हमारे विभाग में पहुंचा ही नहीं जैसे गैर जिम्मेदाराना जवाब देकर अपनी जान छुड़ा लेता है।
और जनता के टैक्स से लाखों की सैलरी लेने वाले ये PIO ‘फाइल गुम है’ या ‘तृतीय पक्ष की जानकारी’ जैसे बहाने ढूंढते हैं।
भ्रष्टाचार का ‘सुरक्षा कवच’ बना सूचना तंत्र:
सबसे गंभीर स्थिति तो तब पैदा होती है, जब कोई सजग नागरिक राज्य सरकार या फिर स्थानीय स्तर के किसी बड़े घोटाले या अवैध निर्माण की जानकारी मांगता है, तो संबंधित विभाग का तंत्र सक्रिय होकर आवेदक को ही निशाना बनाने लगता है।
अनेक मामलों में लोक सूचना पदाधिकारी सीधे तौर पर उन ठेकेदारों और भ्रष्ट इंजीनियरों को सूचना लीक कर देते हैं जिनके खिलाफ जानकारी मांगी गई है। और फिर शुरू होता है गंदा खेल, उस सूचना मांगने वाले को डराने, SC/ST एक्ट और छेड़खानी जैसे संगीन लेकिन फर्जी मुकदमे दर्ज कराना अब एक ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) बन गया है।
‘मूक दर्शक और मुफ्त में वेतनखोरी का अड्डा बना सूचना आयोग:
राज्य सूचना आयोग, जो इस कानून का सर्वोच्च प्रहरी है, वह भी कुछ मामलों में ₹25,000 का जुर्माना लगाकर अपनी पीठ खुद थपथपा लेता है। जबकि ज्यादातर मामलों में राज्य सूचना आयुक्त कार्यालय कर्मी या तो भ्रष्टाचारियों के हिसाब से अपनी कार्रवाई करते है या फिर मूकदर्शक बनकर बड़ी बेशर्मी से मुफ्त में वेतनखोरी करते है।
पटना हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका के अनुसार, दिसंबर 2024 तक आयोग में 28,291 द्वितीय अपीलें लंबित हैं, जो बिहार में RTI को ‘मृत प्राय मानने के लिए काफी है। आरटीआई कानून में प्रावधान के अनुसार आवेदक की हत्या हो जाने पर सूचना के अधिकार के तहत किए गए आवेदन की फाइल बंद कर दी जाती है, जो अपराधियों और भ्रष्ट कर्मियों के लिए प्रोत्साहन है।
आंकड़ों की जुबानी: न्याय की उम्मीद या मौत का खौफ?
बिहार में RTI कार्यकर्ताओं पर निरंतर मौत का खतरा मंडराते रहता है। 2005 से अब तक देशभर में 79 RTI कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, जिसमें बिहार में करीब 20% यानी 26 मामले दर्ज हैं। 2018 में ही 5 हत्याएं हुईं, और कुल 600+ हमले व 70% फर्जी केस RTI कार्यकर्ताओं के खिलाफ हैं।
तंत्र को बदलने की जरूरत: बिहार में RTI कानून अब वेंटिलेटर पर है। यदि समय रहते सूचना आयुक्त कार्यालय ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया और दोषी अधिकारियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की, तो यह कानून केवल कागजों पर नए नाम से ‘भ्रष्टाचार का अधिकार’ बनकर रह जाएगा।
