Saturday, April 11, 2026
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कांपी इंसानियत: घर में घुसकर आबरू लूटी, डरा बाप संकोच में, बेटी ने चुनी आजादी

नालंदा की यह घटना बिहार के ग्रामीण अंचलों में पनप रहे ‘अपराध के खौफ’ और ‘प्रशासनिक इकबाल’ के खत्म होने की कहानी बयां करती है। यहाँ न्याय प्रणाली की हार और अपराधी के दुस्साहस के बीच एक निर्दोष जीवन का अंत हो गया।

​इस मामले का सबसे विचलित करने वाला पहलू अपराधी का बेखौफ होना है। वह न केवल घर में घुसकर दुष्कर्म करता है, बल्कि पीड़ित के पिता के सामने ही हथियार तानकर पूरे परिवार को खत्म करने की धमकी देता है। यह दर्शाता है कि अपराधियों के मन में पुलिस या कानून का कोई भय शेष नहीं रह गया है। जहाँ रक्षक का भय भक्षक को न हो, वहाँ आम नागरिक का जीवन सदैव दांव पर लगा रहता है।

​एक लाचार पिता की विवशता

​समाज और कानून व्यवस्था की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि एक पिता अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी की अस्मत लुटते हुए देखता है, लेकिन तत्काल पुलिस के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पिता का सुबह तक का इंतज़ार करना और चुपचाप काम पर चले जाना कोई लापरवाही नहीं, बल्कि “जान के बदले चुप्पी” का वह खौफनाक समझौता था जो अपराधी ने बंदूक की नोक पर उनसे करवाया था। यह एक पिता की कायरता नहीं, बल्कि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर उस पिता के अविश्वास की पराकाष्ठा है।

​17 वर्षीया छात्रा, जिसने अभी-अभी इंटर पास कर भविष्य के सपने देखे होंगे, उसने इस ‘गंदगी भरे माहौल’ और ‘लाचार व्यवस्था’ में घुट-घुट कर जीने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। उसके लिए वह फंदा केवल आत्महत्या नहीं, बल्कि इस समाज और कमजोर कानून के खिलाफ एक मूक विद्रोह था। उसने शायद यह महसूस किया कि जिस समाज में उसके पिता उसे बचा नहीं सके और जहाँ अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं, वहाँ न्याय की उम्मीद बेमानी है।

​रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस अब पोस्टमार्टम का इंतज़ार कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक बेटी के चले जाने के बाद की जाने वाली यह कार्रवाई उसे वापस ला पाएगी? ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिसिंग का अभाव और दबंगों का बढ़ता वर्चस्व आम आदमी को इस कदर तोड़ देता है कि वह शिकायत करने से पहले अपने परिवार की चिता सजने का डर देखने लगता है।

​यह घटना बिहार की वर्तमान कानून-व्यवस्था पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह लगाती है। जब घर के भीतर भी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं और पिता अपनी बेबसी पर आंसू बहाने को मजबूर है, तो ‘सुशासन’ के दावे खोखले प्रतीत होते हैं। यह एक स्वाभिमानी लड़की के आत्म-बलिदान की वह दास्तां है, जो चीख-चीख कर कह रही है कि अब न्याय केवल कागजों पर नहीं, धरातल पर दिखने की ज़रूरत है।

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